कांग्रेस का चिंतन शिविर: चिंतन शिविर के पांच बड़े प्रस्ताव और राह के कांटे

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राजस्थान के उदयपुर में कांग्रेस के तीन दिवसीय चिंतन शिविर का समापन हो गया है. इस दौरान पार्टी में बदलाव को लेकर कई फैसले लिए गए, जिसमें युवाओं को 50 फीसदी प्रतिनिधित्व देने का फैसला किया तो ‘एक परिवार, एक टिकट’ के साथ ही गठबंधन का भी फॉर्मूला भी पेश किया, लेकिन उसे जमीन पर उतारना पार्टी के लिए आसान नहीं है?


नई दिल्ली। कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान के उदयपुर में कांग्रेस ने तीन दिवसीय नवसंकल्प चिंतन शिविर में अपनी संगठनात्मक कमजोरियों पर मैराथन माथापच्ची और चर्चा-परिचर्चा के बाद भविष्य के लिए तमाम बड़े फैसले लिए हैं. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी तक ने पार्टी नेताओं को संबोधित किया और कांग्रेस को फिर से खड़ा करने के लिए रोडमैप रखा. ऐसे में कांग्रेस ने भले ही अपने कायाकल्प के तमाम उपाय चिंतन शिविर के विचार-मंथन से निकाले हों, लेकिन उन्हें अमलीजामा पहनाना पार्टी के लिए आसान बिल्कुल नहीं है?

कांग्रेस में ‘एक परिवार-एक टिकट’ का नियम
कांग्रेस के चिंतन शिविर में तय किया है कि चुनाव में ‘एक परिवार एक टिकट’ का नियम लागू किया जाएगा. हालांकि इसमें शर्त यह है कि अगर किसी परिवार में किसी दूसरे शख्स को टिकट दिया जाता है तो वह कम से कम पार्टी के लिए 5 साल तक काम कर चुका हो. साथ ही यह भी प्रस्ताव रखा गया है कि पैराशूट उम्मीदवारों को टिकट नहीं देगी।

चुनौती
कांग्रेस ने चिंतन शिविर में भले ही एक परिवार एक टिकट’ का प्रस्ताव पास किया हो और पैराशूट उम्मीदवारों को टिकट न देने की बात कही है. लेकिन पार्टी में लागू करना आसान नहीं है. सियासत में अक्सर देखा गया है कि तमाम बड़े नेता चुनाव से ठीक पहले अपने-बेटे-बेटियों के लिए टिकट की मांग करते रहे हैं और टिकट न मिलने पर पार्टी को अलविदा कह देते हैं. उत्तराखंड में हरक सिंह रावत ने भाजपा सिर्फ इसीलिए छोड़ दी थी क्योंकि पार्टी उनकी बहू को टिकट नहीं दे रही थी और उन्हें कांग्रेस ने उन्हें टिकट दे दिया. ऐसे ही रीता बहुगुणा जोशी के बेटे ने भी बीजेपी को इसीलिए छोड़ दिया, क्योंकि लखनऊ कैंट सीट से पार्टी ने उनको टिकट नहीं दिया।

कांग्रेस में अभी भी ऐसे बहुत से नेता है, जिनके बेटे-बेटियों को अगर कांग्रेस टिकट नहीं देगी तो वो पार्टी छोड़ने में देर नहीं लगाएंगे. ऐसे में कांग्रेस को इस नियम के पालन करना आसान नहीं होगा. इसके अलावा पैराशूट उम्मीदवारों को टिकट न देने का ऐलान भी चुनौती भरा है. विधानसभा से लेकर लोकसभा चुनाव में देखा गया है कि टिकट नही मिलने पर बड़ी संख्या में नेता दलबदल करते हैं और राजनीतिक दल भी मजबूत नेताओं को पार्टी में शामिल करने से लेकर टिकट तक देने से परहेज नहीं करती, क्योंकि उनका अपना सियासी आधार भी होता है. ऐसे में कांग्रेस इस नियम को कैसे लागू कर पायेगी यह बड़ा सवाल है।

कांग्रेस संगठन में युवाओं को 50 फीसदी जगह
कांग्रेस ने शिविर में प्रस्ताव पास किया है कि संगठन में 50 फीसदी युवाओं को महत्व दिया जाएगा. कांग्रेस की कार्यसमिति, राष्ट्रीय पदाधिकारियों, प्रदेश, जिला, ब्लॉक व मंडल पदाधिकारियों में 50 प्रतिशत पदाधिकारियों की आयु 50 वर्ष से कम हो. इतना ही नहीं चुनाव में भी 50 फीसदी टिकट युवाओं को देने का लक्ष्य रखा गया है।

चुनौती
कांग्रेस में युवाओं को महत्व देने की बात भले ही कही जा रही हो, लेकिन ये फॉर्मूला उसी तरह से है, जिस तरह से यूपी में प्रियंका गांधी ने 40 फीसदी टिकट महिलाओं को देने का दांव चला था। इससे कांग्रेस को दो तरह की चुनौतियां का सामना करना पड़ेगा, एक तरफ तो बुजुर्ग नेताओं की नाराजगी सामने आएगी जबकि दूसरी तरह ज्योतिरादित्य सिंधिया से जितिन प्रसाद तक युवा नेता कांग्रेस इसीलिए पार्टी छोड़ गए, क्योंकि पार्टी में उन्हें अहमियत नहीं मिल सकी।

राजस्थान में सचिन पायलट की सीएम गहलोत के साथ अदावत जारी है तो गुजरात में हार्दिक पटेल जैसा युवा नेता इसीलिए परेशान है, क्योंकि उसे पार्टी के वरिष्ठ नेता काम नहीं करने दे रहे हैं. मध्य प्रदेश में कमलनाथ की अगुवाई में कांग्रेस ने चुनाव लड़ने का ऐलान कर रखा है तो हरियाणा में पार्टी भूपेंद्र सिंह हुड्डा के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है. ऐसे में कांग्रेस संगठन से लेकर टिकट तक में 50 फीसदी युवाओं को कैसे दे पाएगी यह भी बड़ा सवाल है।

कांग्रेस को दोबारा से जनता से जोड़ने का प्लान
राहुल गांधी ने चिंतन शिविर में कहा कि कांग्रेस को जनता से टूटे कनेक्शन को दोबारा से जोड़ने के लिए सड़क पर उतरना होगा और जनता के बीच जाकर पसीना बहाना होगा. इसके लिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक के लिए पदयात्रा निकालने का भी प्लान बनाया है।

चुनौती
कांग्रेस को मजूबत विपक्ष के लिए निश्चित तौर पर आक्रमक भूमिका निभानी होगी ताकि सरकार की मनमानी पर रोक लग सके. ऐसे में उसके लिए कांग्रेस को सड़कों पर उतरना होगा, पसीना भी बहाना होगा, पुलिस की लाठियां भी खानी होंगी और जेल भी जाना होगा. सत्ता खोने के बाद के आठ सालों में कांग्रेस के अधिकतर नेता आम जनता से लगभग पूरी तरह से कट चुके हैं. कांग्रेस भले ही संसद में विपक्ष की भूमिका निभा रही है, लेकिन पार्टी के नेता सड़कों पर उतरकर आम जनता को अपने साथ जोड़ने की कला में उतने माहिर नहीं हैं, जितनी महारत विपक्ष में रहते हुए बीजेपी नेताओं में हुआ करती थी. ऐसे में देखा गया कि कांग्रेस अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद देश में बढ़ती हुई महंगाई या बेरोजगारी को उस जन आंदोलन में नहीं बदल सकी, जहां आम जनता को भी लगे कि पार्टी उसकी तकलीफ को ही अपनी आवाज दे रही है।

बीजेपी-संघ पर आक्रामक, हिंदुत्व का कैसे करेगी मुकाबला
उदयपुर के चिंतन शिविर के समापन पर राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस एक परिवार है और मैं आपके परिवार का सदस्य हूं. मेरी लड़ाई आरएसएस और बीजेपी की विचारधारा से है जो देश के सामने एक खतरा बनी हुई है, उससे मेरी लड़ाई है. ये लोग जो जाति धर्म के नाम पर नफरत फैलाते हैं, हिंसा फैलाते हैं… इसके खिलाफ मैं लड़ता हूं और लड़ना चाहता हूं. ये मेरी जिंदगी की लड़ाई है.’

चुनौती
बेशक राहुल गांधी ने संघ की विचारधारा के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए खुद के साथ ही बाकी पार्टी नेताओं के दिलो दिमाग में ऑक्सीजन देने का काम किया है. लेकिन यहां भी बड़ा सवाल ये है कि कांग्रेस के पास संघ व भाजपा के उस ‘हिंदुत्व’ से निपटने के लिए कोई ऐसा रोड मेप तैयार है कि इस देश का बहुसंख्य हिंदू उसे मान भी ले और वो कांग्रेस का गुणगान भी करने लगे? इसके अलावा भाजपा और संघ का हिंदुत्व अब खुलकर खेल रहा है और उसे चुनावी सफलता भी मिल रही है, जिसकी काट कांग्रेसी किस तरह से कर पाएंगे?

गठबंधन पर विकल्प खुले रखेगी कांग्रेस
कांग्रेस ने उदयपुर के चिंतन शिविर में बीजेपी पर करारा प्रहार करते हुए कहा है कि बीजेपी को कोई भी क्षेत्रीय दल हरा नहीं सकता, इसलिए कांग्रेस परिस्थितियों के अनुरूप समान विचारधारा वाली राजनीतिक पार्टियों से गठबंधन का विकल्प खुला रखेगी. कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की अध्यक्षता वाली समन्वय समिति की सिफारिश के आधार पर तैयार नवसंकल्प में कहा गया है, राष्ट्रीयता की भावना व प्रजातंत्र की रक्षा के लिए कांग्रेस सभी समान विचारधारा के दलों से संवाद और संपर्क स्थापित करने को कटिबद्ध है तथा राजनैतिक परिस्थितियों के अनुरूप जरूरी गठबंधन करने के रास्ते खुले रखेगी।

चुनौती
कांग्रेस ने सामान विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन का विकल्प खुले रखने का प्रस्ताव रखा है, लेकिन गठबंधन की राजनीति पर कांग्रेस नेता ही एकमत नहीं हैं. कांग्रेस के कई नेताओं की राय थी कि अकेले चुनाव लड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. इसके अलावा कांग्रेस को लगातार मिल रही हार से कई सहयोगी दल खुद भी दूरी बना रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस किस तरह से बीजेपी के खिलाफ मजबूत गठबंधन खड़ा कर पाएगी. बिहार में आरजेडी लगातार कांग्रेस को दरकिनार कर रही है तो यूपी में कोई भी दल कांग्रेस के साथ खड़े होने को तैयार नहीं है. पश्चिम बंगाल में कांग्रेस लेफ्ट और ममता बनर्जी में किसके साथ जाए. वहीं, कई क्षेत्रीय दल ऐसे ही, जो बीजेपी के साथ भी नहीं है, लेकिन वो कांग्रेस के साथ भी आने के लिए रजामंद नहीं दिख रहे. ऐसे में कांग्रेस इन तमाम चुनौती से कैसे पार पाएगी?

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