मुख्यमंत्री धामी ने रिकॉर्ड मतों से जीता चंपावत उपचुनाव, कांग्रेस तीन हज़ार वोटों पर सिमटी

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देहरादून।चंपावत विधानसभा उपचुनाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। चुनाव का नतीजा आज सामने आया तो भाजपा प्रत्याशी पुष्कर सिंह धामी (58258 वोट) की सुनामी में कांग्रेस तहस-नहस हो गई। उसकी प्रत्याशी निर्मला गहतौड़ी (3233 वोट) की जमानत तक जब्त हो गई। माना कि उत्तराखंड में कोई भी मुख्यमंत्री अपना उपचुनाव नहीं हारे लेकिन इस रिकॉर्ड प्रचंड जीत के सामने सारे पुराने रिकॉर्ड उसी तरह ध्वस्त हो गए। उपचुनाव जंग की बजाए कांंग्रेस की धुनाई साबित हुई। 93 फीसदी वोटों के साथ ऐतिहासिक जीत हासिल करने से बेहद भावुक पुष्कर ने कहा कि, मैं लोगों का इतना स्नेह और विश्वास खुद के प्रति देख के अभिभूत- चमत्कृत और निः-शब्द हूँ। मेरा फर्ज है कि राज्य और लोगों के विकास के लिए जान लगा दूँ। वादा करता हूँ कि उम्मीदों पर सौ फीसदी खरा उतरूँगा।’

13 राउंड की गणना के बाद 55025 वोटों से विजय की घोषणा होते ही पुष्कर ने तत्काल पार्टी आला कमान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी-गृह मंत्री अमित शाह-पार्टी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का आभार प्रकट किया कि उन्होंने बहुत विश्वास कर के लगातार दो बार मुख्य सेवक के तौर पर देवभूमि की सेवा करने का महान अवसर दिया। साथ ही चंपावत की अवाम के प्यार और अपने प्रति अद्भुत यकीन पर कहा कि उन्होंने सिर्फ जिताने के लिए मेहनत नहीं की बल्कि ये भी सफल कोशिश की कि मुझको रिकॉर्ड विजय दिला के विधानसभा पहुंचाना है। इस खूबसूरत शहर को बिना पर्यावरणीय छेड़छाड़ और कुदरती सौन्दर्य को छुए बिना सबसे विकसित स्वरूप प्रदान किया जाएगा।

धामी की बड़ी जीत को ले के चुनाव से पहले से ही कोई शक नहीं था लेकिन जीत का अंतर आधा लाख से अधिक होगा, ऐसा सोचने वाले बहुत कम थे। सच तो ये है कि जिस गंभीरता से पुष्कर और भाजपा ने चुनाव लड़ना शुरू किया, उसने कांग्रेस के छक्के पहले दिन ही छुड़ा दिए। चुनाव में गर्मी आती, उससे पहले ही कांग्रेस के `हाथ’ ने आत्म समर्पण कर दिया। पिछले चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रहे हेमेश खर्कवाल के चुप बैठ जाने और केंद्र से कोई भी बड़ा चेहरा प्रचार के लिए न आने से भाजपा का विजय अंतर अविश्वासनीय हो गया। निर्मला ने दो दिन पहले ही बयान जारी कर ये साफ कर दिया था कि Bye-Election में कांग्रेस और उनके साथ क्या होने वाला है। उन्होंने खुल्ला कह दिया था कि पार्टी ने चुनाव लड़ा ही नहीं। वह पूरे चुनाव के दौरान अकेले ही पुष्कर के खिलाफ जूझती रही।

पुष्कर आज सुबह जब मतगणना शुरू हुई तो पहले दौर से ही तगड़ी बढ़त लेने लगे। जैसे-जैसे दौर बढ़ते रहे, विजय का अंतर हैरत अंगेज़ ढंग से भीषण और बड़ा होता चला गया। मुख्यमंत्री बने रहने के लिए हुए Bye-Election में आज तक सबसे बड़ी फतह का रेकॉर्ड विजय बहुगुणा के नाम दर्ज था। उन्होंने सितारगंज में 40 हजार वोटों से फतह पाई थी। तब वह कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री थे। उनके खिलाफ भाजपा की तरफ से प्रकाश पंत चुनावी अखाड़े में उतरे थे। उनके बाद मुख्यमंत्री बने हरीश रावत ने भी धारचूला Bye-Election में 19 हजार वोटों से जीत पाई थी।

मुख्यमंत्री बने रहने के लिए भुवन चंद्र खंडूड़ी को साल 2007 में जो धुमाकोट Bye-Election लड़ना पड़ा, उसमें वह 14 हजार वोटों से ही जीत पाए थे। एनडी तिवारी पहले मुख्यमंत्री थे, जो उत्तराखंड में Bye-Election लड़े। बेहद बड़े नाम और लोकप्रिय चेहरा होने के बावजूद वह रामनगर सीट पर 23220 वोटों से ही विजयी हुए थे। पुष्कर के मुक़ाबले लगभग 33 हजार वोट कम मिले थे। पुष्कर की विजय इतनी जबर्दस्त रही कि निर्मला और बाकी दो निर्दलीय प्रत्याशी जमानत तक गंवा बैठे। भाजपा प्रदेश कार्यालय बलबीर रोड और बाकी सभी जिलों में पार्टी के कार्यालयों में नतीजों के चरणों के हिसाब से सामने आते रहने के दौरान गज़ब का उत्साह ओहदेदारों और कार्यकर्ताओं के बीच देखा गया।

वे नगाड़े की थाप पर डांस कर रहे थे। एक-दूसरे को गले मिल के हाथ मिला के बधाई दे रहे थे। शुरुआती 2-3 दौर के नतीजों से ही साफ हो गया था कि पुष्कर रिकॉर्ड विजय दर्ज करेंगे। खटीमा में किसान आंदोलन-पूर्व सैनिकों की वन रैंक-वन पेंशन को ले के नाराजगी-थारू जनजाति के भाजपा से कुछ खिंचे रहने और भाजपा के ही कई दिग्गजों के पीठ पर छिप के छुरे से वार करने के चलते पुष्कर को शिकस्त का सामना करना पड़ा था। चंपावत में इनमें से एक भी फैक्टर उनके खिलाफ काम नहीं कर रहा था। लोगों के दिमाग में साफ था कि उनके सामने मुख्यमंत्री और विधायक में से एक चुनने की अहम ज़िम्मेदारी है। उन्होंने मुख्यमंत्री को अपना विधायक चुनने के स्मार्ट फैसले के साथ जाना पसंद किया।

इस तरह खटीमा में पुष्कर को जो पीड़ा मिली, उसको चंपावत ने शानदार और रिकॉर्ड फतह दिला के हर लिया। पार्टी हाई कमान और मोदी-शाह-नड्डा-संघ की चौकड़ी को खटीमा चुनाव की हकीकत के बारे में शुरू से मालूम था। उन्होंने इसी लिए बे-हिचक पुष्कर को ही विधायक न बन पाने के बावजूद फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया। 5 साल मुख्यमंत्री बने रहने के लिए विधानसभा चुनाव जीतना जरूरी था। कैलाश गहतौड़ी ने चंपावत की सीट छोड़ के पुष्कर की विजय को भव्य बनाने के लिए फिर जी-जान लगा दिया। आज नतीजा मिल गया।

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