Astitva Times Desk
7 Min Read

कांग्रेस की न्याय यात्रा में गुटबाजी का विस्फोट! हरक और आर्येंद्र के समर्थक आमने -सामने, प्रीतम सिंह को संभालना पड़ा मोर्चा

सरकार को घेरने निकली कांग्रेस अपने ही नेताओं के समर्थकों की नारेबाजी में उलझी; सहसपुर में टिकट की दावेदारी और शक्ति प्रदर्शन ने खोली संगठनात्मक एकजुटता की पोल

देहरादून। उत्तराखंड में भाजपा सरकार को घेरने और आगामी विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक जमीन तैयार करने निकली कांग्रेस की न्याय यात्रा को सहसपुर में अपने ही संगठन की अंदरूनी खींचतान का सामना करना पड़ा। सेलाकुई में आयोजित कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ कांग्रेस नेता डॉ. हरक सिंह रावत और सहसपुर से विधानसभा चुनाव की दावेदारी कर रहे आर्येंद्र शर्मा के समर्थकों के बीच नारेबाजी और शक्ति प्रदर्शन की स्थिति पैदा हो गई। हालात ऐसे बने कि कार्यक्रम में मौजूद वरिष्ठ नेता प्रीतम सिंह को स्वयं हस्तक्षेप कर समर्थकों को शांत कराने की कोशिश करनी पड़ी।

कांग्रेस के लिए यह घटनाक्रम इसलिए भी असहज करने वाला है, क्योंकि न्याय यात्रा का मकसद प्रदेश सरकार के खिलाफ जनमुद्दों को लेकर एकजुट राजनीतिक अभियान चलाना है। लेकिन सहसपुर में यात्रा के दौरान सामने आई तस्वीर ने पार्टी के भीतर चल रही स्थानीय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को सार्वजनिक कर दिया। जिस मंच से भाजपा सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद होनी थी, वहां नेताओं के समर्थकों की नारेबाजी ने पार्टी की अंदरूनी राजनीति को सुर्खियों में ला दिया।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सेलाकुई में न्याय यात्रा के तहत आयोजित कार्यक्रम के दौरान डॉ. हरक सिंह रावत और आर्येंद्र शर्मा के समर्थक अपने -अपने नेताओं के पक्ष में नारेबाजी करने लगे। दोनों नेताओं के समर्थन में हुई नारेबाजी से माहौल गरमा गया और कार्यक्रम में असहज स्थिति पैदा हो गई। इस घटनाक्रम को सहसपुर विधानसभा सीट पर आगामी चुनाव की दावेदारी से जोड़कर देखा जा रहा है। आर्येंद्र शर्मा पहले भी इस विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ चुके हैं और आगामी चुनाव के लिए भी उनकी दावेदारी चर्चा में है। वहीं डॉ. हरक सिंह रावत की सहसपुर सीट में राजनीतिक रुचि ने स्थानीय समीकरणों को और महत्वपूर्ण बना दिया है। ऐसे में समर्थकों के बीच हुई नारेबाजी को महज सामान्य राजनीतिक उत्साह मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं है। यह घटनाक्रम सहसपुर में कांग्रेस के भीतर उभरती चुनावी प्रतिस्पर्धा और नेतृत्व के सामने मौजूद समन्वय की चुनौती को रेखांकित करता है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि कार्यक्रम में मौजूद वरिष्ठ नेता प्रीतम सिंह को स्थिति संभालने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने समर्थकों को शांत कराने का प्रयास किया। राजनीतिक दृष्टि से यह तस्वीर कई सवाल खड़े करती है। प्रीतम सिंह जैसे वरिष्ठ नेता की मौजूदगी में यदि पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच अपने -अपने नेताओं को लेकर प्रतिस्पर्धा सार्वजनिक मंच पर दिखाई दे तो यह संगठनात्मक तालमेल के लिहाज से चिंता का विषय है। स्पष्ट है कि सहसपुर में कांग्रेस की स्थानीय राजनीति में चुनावी दावेदारी का दबाव दिखाई देने लगा है।

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पार्टी के नेता और कार्यकर्ता सरकार के खिलाफ साझा लड़ाई लड़ने के बजाय अपनी -अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में न उलझ जाएं।
सहसपुर में सामने आया घटनाक्रम इसी चुनौती की ओर इशारा करता है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए टिकट की दावेदारी और स्थानीय नेतृत्व को लेकर प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, लेकिन जब यह प्रतिस्पर्धा पार्टी के सार्वजनिक कार्यक्रमों में नारेबाजी और शक्ति प्रदर्शन का रूप लेने लगे तो संगठन की छवि प्रभावित होना तय है। पार्टी के लिए यह भी विचारणीय है कि चुनाव से पहले ही यदि दावेदारों के समर्थकों के बीच इस तरह की प्रतिस्पर्धा सामने आ रही है तो टिकट वितरण के समय संगठनात्मक एकता बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण होगा।

वर्ष 2017 से उत्तराखंड की सत्ता से बाहर कांग्रेस के सामने इस बार राजनीतिक वापसी की बड़ी चुनौती है। पार्टी को बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और जनहित के मुद्दों पर भाजपा सरकार को घेरने का अवसर मिला है। न्याय यात्रा के माध्यम से कांग्रेस इन्हीं मुद्दों को जनता के बीच ले जाने का प्रयास कर रही है। लेकिन राजनीतिक अभियान की विश्वसनीयता तभी मजबूत होती है, जब पार्टी का अपना संगठन भी एकजुट दिखाई दे। सहसपुर की घटना ने इस मोर्चे पर कांग्रेस के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है। यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या प्रदेश नेतृत्व स्थानीय स्तर पर नेताओं और उनके समर्थकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर पाएगा? क्या विधानसभा चुनाव की तैयारियों के दौरान व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को संगठन के सामूहिक हित से ऊपर नहीं आने दिया जाएगा?

सेलाकुई का घटनाक्रम कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक सबक हो सकता है। पार्टी जिस न्याय, अधिकार और जनहित की लड़ाई को लेकर जनता के बीच पहुंच रही है, उस अभियान की सफलता के लिए नेताओं के बीच तालमेल और कार्यकर्ताओं की एकजुटता बेहद जरूरी है। सहसपुर में हुई नारेबाजी ने यात्रा के राजनीतिक संदेश को पीछे छोड़कर संगठन की अंदरूनी प्रतिस्पर्धा को चर्चा में ला दिया। अब कांग्रेस नेतृत्व के सामने चुनौती है कि इस घटनाक्रम को महज एक दिन की अव्यवस्था मानकर छोड़ने के बजाय स्थानीय संगठन में बेहतर समन्वय की दिशा में ठोस कदम उठाए।

सवाल सीधा है—कांग्रेस सहसपुर में भाजपा को चुनौती देने की तैयारी कर रही है या पहले उसे अपने ही नेताओं के बीच चुनावी प्रतिस्पर्धा को संभालने की रणनीति बनानी होगी?
क्योंकि चुनावी राजनीति में दावेदारी करना हर नेता का अधिकार हो सकता है, लेकिन पार्टी के सार्वजनिक मंच को शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बना देना संगठन के हित में नहीं है। सहसपुर की न्याय यात्रा ने कांग्रेस को यही आईना दिखाया है।

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!