देहरादून। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री रिटायर्ड मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी का निधन हो गया है। उनके निधन की खबर फैलते ही प्रदेशभर में शोक की लहर दौड़ गई। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे और अस्पताल में भर्ती थे। 91 वर्षीय खंडूड़ी ने आज अस्पताल में लगभग ग्यारह बजे अंतिम सांस ली।
भुवन चंद्र खंडूरी का जन्म 1 अक्टूबर 1934 को देहरादून में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय, कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग (पुणे), इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स (दिल्ली) और इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस मैनेजमेंट (सिकंदराबाद) से शिक्षा ग्रहण की। छात्र जीवन में वे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भी हिस्सा लेते रहे।
36 साल तक भारतीय सेना में सेवा दी
सन् 1954 से 1990 तक , यानी पूरे 36 साल उन्होंने भारतीय सेना के कोर ऑफ इंजीनियर्स में सेवा दी। इस लंबी सेवा के दौरान वे रेजीमेंट के कमांडर रहे, 1971 के भारत-पाक युद्ध में हिस्सा लिया, सेना में चीफ इंजीनियर का पद संभाला और आर्मी हेडक्वार्टर में एडिशनल मिलिट्री सेक्रेटरी भी रहे। 1982 में राष्ट्रपति द्वारा उन्हें उनकी असाधारण सेवाओं के लिए ‘अति विशिष्ट सेवा मेडल’ से सम्मानित किया गया।
1990 के दशक में उन्होंने राजनीति में कदम रखा। और उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली। एक रिटायर्ड मेजर जनरल के लिए राजनीति का रास्ता नया था, लेकिन उन्होंने यहां भी अपनी कार्यकुशलता दिखाई। 1991 में पहली बार गढ़वाल लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर वे संसद पहुंचे। इसके बाद 1998, 1999 और 2004 में भी वे इसी सीट से जीतते रहे। वे अपने सख्त अनुशासन, साफ-सुथरी छवि और ईमानदार कार्यशैली के कारण राजनीति में एक अलग पहचान रखते थे।
भुवन चंद्र खंडूरी की गिनती पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भरोसेमंद नेताओं में होती थी। पहली बार लोकसभा पहुंचने के दो साल के भीतर ही खंडूड़ी को पार्टी का मुख्य सचेतक बना दिया गया था। 1996 के लोकसभा चुनाव में भुवन चंद्र खंडूरी को हार का सामना करना पड़ा था। वर्ष 1999 में अटल बिहारी सरकार में उन्हें सड़क परिवहन मंत्री बनाया गया और इस पद पर रहते हुए उनके द्वारा सड़कों, हाईवे के लिए किए गए काम को आज भी याद किया जाता है।

वर्ष 2007-2009 और 2011-2012 तक खंडूड़ी दो बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे। यह वही दौर था जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी के स्वास्थ्य खराब था और कई बड़े नेता खंडूरी को हटाने में जुट गए। जिसके बाद सूबे की कमान रमेश पोखरियाल निशंक के हाथों में आ गई। लेकिन जब सूबे में भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर हुए तो एक बार फिर केंद्रीय नेतृत्व ने एक बार फिर से खंडूरी पर भरोसा जताया और 2011 में उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बना दिया गया। साल 2014 में मोदी लहर की वजह से भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई तो खंडूरी को रक्षा मामलों की संसदीय समिति का अध्यक्ष बनाया गया।
उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि खंडूरी जी ने भारतीय सेना में रहते हुए राष्ट्र सेवा, अनुशासन और समर्पण का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया। सैन्य जीवन से लेकर सार्वजनिक जीवन तक उनका व्यक्तित्व राष्ट्रहित और जनसेवा के प्रति समर्पित रहा। राजनीतिक जीवन में उन्होंने उत्तराखंड के विकास, सुशासन, पारदर्शिता और ईमानदार कार्यशैली की मजबूत पहचान बनाई।
एक जननेता के रूप में उन्होंने प्रदेश के विकास हेतु अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिए और अपनी सादगी, स्पष्टवादिता एवं कार्यकुशलता से लोगों के हृदय में विशेष स्थान बनाया। उनका निधन उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति है। ईश्वर से प्रार्थना है कि पुण्यात्मा को श्रीचरणों में स्थान तथा शोकाकुल परिजनों को यह दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करें।











