बिना मान्यता वाले मदरसे चलाना अवैध नहीं: हाईकोर्ट

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लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश में बिना सरकारी मान्यता (Unrecognised) के मदरसा चलाना अपने -आप में अवैध नहीं है। न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकार की नियंत्रण और नियमन की शक्ति केवल मान्यता प्राप्त मदरसों तक ही सीमित है और बिना मान्यता वाले मदरसों को जबरन बंद करना या उनके विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई करना असंवैधानिक होगा।

 

यह ऐतिहासिक निर्णय Writ-C No. 307 of 2026 में सुनाया गया, जिसकी सुनवाई माननीय न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी द्वारा की गई। न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि संविधान के तहत अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी धार्मिक और शैक्षिक संस्थाएं स्थापित करने और संचालित करने की स्वतंत्रता प्राप्त है। यदि कोई मदरसा केवल धार्मिक शिक्षा प्रदान कर रहा है और उसने सरकारी मान्यता प्राप्त नहीं की है, तो मात्र इस आधार पर उसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार केवल उन्हीं मदरसों पर नियम लागू कर सकती है, जिन्होंने स्वेच्छा से सरकारी मान्यता प्राप्त की है।
बिना मान्यता वाले मदरसों को बंद करने, सील करने या उन पर दंड लगाने की कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 19, 25 और 30 की भावना के विपरीत होगी।
धार्मिक शिक्षा देना नागरिकों का मूल अधिकार है, जब तक कि वह किसी कानून या सार्वजनिक व्यवस्था का उल्लंघन न करे।

अल्पसंख्यक अधिकारों को मजबूती
इस फैसले को अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक और शैक्षिक स्वतंत्रता की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है। न्यायालय ने माना कि सभी शैक्षणिक संस्थानों को एक ही तराजू में तौलना उचित नहीं है, विशेषकर जब वे केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित हों और सरकारी सहायता या मान्यता का दावा न कर रहे हों।

फैसले की प्रमुख विशेषताएं
बिना मान्यता वाले मदरसे चलाने पर कोई कानूनी रोक नहीं।
धार्मिक शिक्षा देने वाले मदरसे स्वतंत्र रूप से संचालित हो सकते हैं।
राज्य सरकार की नियंत्रण शक्ति केवल मान्यता प्राप्त संस्थाओं तक सीमित।

व्यापक प्रभाव
कानूनी जानकारों के अनुसार, यह फैसला भविष्य में उन सभी मामलों के लिए नज़ीर बनेगा, जिनमें बिना मान्यता वाले धार्मिक शिक्षण संस्थानों पर सरकारी कार्रवाई की गई है या की जा सकती है। इससे न केवल मदरसों बल्कि अन्य धार्मिक शिक्षण संस्थानों के अधिकारों को भी स्पष्टता मिलेगी।
कुल मिलाकर, इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय संविधान में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों की पुनः पुष्टि करता है और राज्य की सीमाओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है।