असली मतदाता के वोट पर ‘फर्जी वार’! क्या आपत्तिकर्ता के खिलाफ एक्शन लेगा चुनाव आयोग

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फॉर्म-7 की आपत्ति ने खोली व्यवस्था की पोल : बचपन से क्षेत्र में रह रहे व्यक्ति को बता दिया शिफ्टेड, अज्ञात युवक के दावे पर सवालों के घेरे में निर्वाचन तंत्र

देहरादून। लोकतंत्र में जिस वोट को सबसे ताकतवर हथियार माना जाता है, उसी वोट को लेकर ऐसा मामला सामने आया है जिसने निर्वाचन व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि एक अज्ञात युवक ने फॉर्म-7 के जरिए एक मतदाता के नाम पर आपत्ति दर्ज कर दावा कर दिया कि वह अपना घर छोड़कर जा चुका है। जबकि संबंधित मतदाता का कहना है कि वह बचपन से वहीं रह रहा है और आज भी वहीं निवास करता है। सवाल सिर्फ एक आपत्ति का नहीं है। सवाल यह है कि किसी नागरिक के मताधिकार पर उंगली उठाने वाले व्यक्ति की सूचना को जांच की कसौटी पर कितना परखा गया?

राजपुर निवासी पीड़ित फैजी अलीम के अनुसार, उसके मोबाइल पर संदेश आने के बाद उसे पता चला कि किसी ने उसके नाम पर आपत्ति दर्ज की है। पीड़ित का कहना है कि वह आपत्तिकर्ता को जानता तक नहीं। अगर यह दावा सही है तो निर्वाचन व्यवस्था के सामने सबसे पहला सवाल यही है कि एक अपरिचित व्यक्ति को किसी नागरिक के मतदाता अधिकार पर आपत्ति दर्ज कराने का आधार और अधिकार कहां से मिला और उसकी सूचना का सत्यापन किस स्तर पर हुआ?

मामला इसलिए भी बेहद गंभीर है क्योंकि फॉर्म-7 में झूठी घोषणा के खिलाफ बाकायदा कानूनी चेतावनी मौजूद है। निर्वाचन आयोग के फॉर्म-7 में स्पष्ट किया गया है कि मतदाता सूची से संबंधित जानबूझकर झूठा बयान या घोषणा करना जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत अपराध है, जिसके लिए एक वर्ष तक का कारावास, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। यानी किसी वास्तविक मतदाता के खिलाफ जानबूझकर झूठी जानकारी देकर उसके नाम को प्रभावित करने की कोशिश को कानून ने मामूली कागजी गलती नहीं माना है। अब बड़ा सवाल यही है कि अगर आपत्ति झूठी साबित होती है तो क्या सिर्फ मतदाता को सफाई देनी होगी, या झूठी आपत्ति करने वाले से भी कानून के मुताबिक जवाब मांगा जाएगा?

मतदाता कटघरे में, शिकायतकर्ता कहां?
निर्वाचन सूची को शुद्ध करना जरूरी है। फर्जी और अपात्र नाम हटाना भी जरूरी है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब वास्तविक मतदाता को ही अपने वोट का अस्तित्व बचाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें। जो नागरिक वर्षों से उसी क्षेत्र में रह रहा है, उसके खिलाफ अचानक यह दावा कर दिया जाए कि वह घर छोड़ चुका है—तो क्या इतना भर लिख देना पर्याप्त है? या फिर शिकायतकर्ता से भी यह पूछा जाना चाहिए कि उसने यह जानकारी कहां से प्राप्त की?

एक गलत आपत्ति किसी नागरिक को मतदान से वंचित कर सकती है। फिर उस गलत आपत्ति की कीमत कौन चुकाएगा?
क्या फॉर्म-7 व्यवस्था का ‘हथियार’ बन गया है?
फॉर्म-7 का उद्देश्य मतदाता सूची में गलत नामों और गलत प्रविष्टियों को दुरुस्त करना है। लेकिन यदि इसका इस्तेमाल किसी वास्तविक मतदाता के नाम पर गलत दावा करने के लिए होने लगे तो यही प्रक्रिया लोकतांत्रिक अधिकार के लिए खतरा बन सकती है। शिकायतकर्ता का कहना है कि उसके मामले के अलावा स्थानीय निवासी मंसूर अहमद के परिवार के एक सदस्य के साथ भी ऐसी ही परेशानी सामने आई है। उनको भी क्षेत्र से स्थानांतरण किए जाने की बात कही गई है। यदि एक से अधिक मामलों में इसी तरह की शिकायतें सामने आ रही हैं, तो अब सवाल केवल एक शिकायत का नहीं रह जाता। बल्कि यह पूरी प्रक्रिया पर प्रश्न चिन्ह है। जिसके बाद बड़ा सवाल यह है कि क्या जिले में फॉर्म-7 के जरिए की गई आपत्तियों की कोई स्वतंत्र समीक्षा होगी? क्या यह देखा जाएगा कि कितनी आपत्तियां वास्तविक थीं और कितनी आधारहीन?

ईआरओ के सामने अब असली अग्निपरीक्षा
पीड़ित ने निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी से शिकायत कर मामले की जांच की मांग की है। अब गेंद निर्वाचन तंत्र के पाले में है। अधिकारियों को सिर्फ यह तय नहीं करना होगा कि संबंधित मतदाता सूची में रहेगा या नहीं। उन्हें यह भी स्पष्ट करना होगा कि—
आपत्ति किसने दर्ज की?
शिकायतकर्ता की पहचान और पात्रता कैसे सत्यापित हुई?
मतदाता के घर छोड़ने का दावा किस प्रमाण पर आधारित था?
क्या मौके पर जाकर सत्यापन किया गया?
यदि आरोप गलत निकला तो झूठी जानकारी देने वाले के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी?
और यदि यह एक से अधिक मामलों में हुआ है तो क्या पूरे मामले की व्यापक जांच होगी?

लोकतंत्र में वोट बचाना नागरिक की जिम्मेदारी या सिस्टम की?
मतदाता सूची में नाम होना लोकतांत्रिक अधिकार का बुनियादी आधार है। ऐसे में किसी वास्तविक मतदाता के नाम पर झूठी या संदिग्ध आपत्ति दर्ज होना केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का विषय नहीं है। जिस व्यवस्था का काम नागरिक के वोट की रक्षा करना है, अगर उसी व्यवस्था में कोई बाहरी व्यक्ति झूठी सूचना देकर नागरिक के वोट पर सवाल खड़ा कर दे, तो जवाबदेही तय होना जरूरी है। और कानून में सजा का प्रावधान होने के बावजूद यदि झूठी आपत्ति करने वाले पर कार्रवाई नहीं होती, तो इससे एक बेहद खतरनाक संदेश जाएगा—मतदाता परेशान हो सकता है, उसका वोट सवालों में घिर सकता है, लेकिन गलत सूचना देने वाला बेखौफ रह सकता है।

अब सवाल सीधा है—झूठी आपत्ति करने वाले पर कार्रवाई कब?
अगर जांच में शिकायत सही पाई जाती है तो संबंधित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी वास्तविक मतदाता के खिलाफ जानबूझकर झूठी सूचना देकर आपत्ति दर्ज कराई गई, तो फिर कानून में मौजूद दंडात्मक प्रावधानों का इस्तेमाल क्यों न हो?
मतदाता को अपने वोट का पहरा देने के लिए मजबूर मत कीजिए। फर्जी दावे करने वालों को कानून का डर दिखाइए।
क्योंकि लोकतंत्र में वोट काटने की कोशिश भी उतनी ही गंभीर है, जितनी वोट के अधिकार की अनदेखी।
अब देखना यह है कि निर्वाचन तंत्र इस शिकायत को सिर्फ एक फाइल मानकर बंद करता है या झूठी आपत्ति की तह तक जाकर जिम्मेदारी भी तय करता है।