11 जुलाई को अस्थायी पुलिया बहने के अगले ही दिन खोला गया था नया पुल, अब निर्माण गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न
देहरादून। राजधानी देहरादून में प्रेमनगर स्थित टौंस नदी के ऊपर नंदा की चौकी में निर्मित लगभग 16 करोड़ रुपये की लागत वाला नया पुल पहली ही भारी बारिश के बाद धंसाव की चपेट में आ गया। मात्र 16 दिन में ही पुल में हुए धंसाव ने न केवल लोक निर्माण विभाग के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि करोड़ों रुपये की लागत से तैयार सरकारी परियोजनाओं की गुणवत्ता, तकनीकी परीक्षण और निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर चर्चा शुरू हो गई है।
इसी महीने 11 जुलाई की रात टौंस नदी में आए उफान के कारण ह्यूम पाइपों के सहारे बनाई गई अस्थायी पुलिया बह गई थी। इसके चलते देहरादून और पांवटा साहिब के बीच आवागमन प्रभावित हो गया था। संपर्क बहाल करने की चुनौती के बीच लोक निर्माण विभाग ने शेष कार्य पूरा कर 12 जुलाई से नए पुल पर वाहनों की आवाजाही शुरू करा दी। उस समय इसे क्षेत्र के लिए बड़ी राहत और विभाग की उपलब्धि बताया गया था।हालांकि, पुल खुलने के कुछ ही दिनों बाद पहली भारी बारिश में उसमें धंसाव सामने आने से कई सवाल उठने लगे हैं।
प्रेमनगर कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष जितेन्द्र तनेजा का कहना है कि जिस पुल को लंबे समय तक सुरक्षित और टिकाऊ समाधान के रूप में प्रस्तुत किया गया था, वह इतनी जल्दी प्रभावित कैसे हो गया? यदि निर्माण कार्य निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप हुआ था, तो ऐसी स्थिति क्यों बनी, यह सीधे सीधे भ्रष्टाचार का मामला है। तनेजा का कहना है कि बरसात के मौसम में इस मार्ग पर हर वर्ष किसी न किसी प्रकार की समस्या सामने आती है। कभी अस्थायी पुलिया बह जाती है तो कभी सड़क या पुल प्रभावित हो जाता है। उनका मानना है कि बार-बार अस्थायी व्यवस्थाओं के बजाय स्थायी और मजबूत समाधान की आवश्यकता है। उन्होंने जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
वरिष्ठ समाजसेवी यशवीर आर्य का कहना है कि करोड़ों रुपये की लागत से बने पुल में इतनी जल्दी धंसाव होना चिंता का विषय है। उनका मानना है कि पूरे निर्माण कार्य की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जानी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि धंसाव का वास्तविक कारण क्या है और क्या निर्माण या गुणवत्ता नियंत्रण में किसी स्तर पर कोई कमी रही। उन्होंने सरकार से मांग की है कि मामले की जांच कर दोषी अधिकारियों के खिलाफ बर्खास्तगी की कार्रवाई की जाए ताकि आगे इस प्रकार के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सके।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि किसी भी पुल की वास्तविक परीक्षा मानसून के दौरान होती है। यदि शुरुआती दौर में ही किसी प्रकार का धंसाव दिखाई देता है तो उसके कारणों का वैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक हो जाता है, ताकि भविष्य में किसी बड़े हादसे की आशंका को समय रहते टाला जा सके।
फिलहाल संबंधित विभाग की ओर से धंसाव के कारणों को लेकर विस्तृत आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। ऐसे में स्थानीय लोग पारदर्शी जांच और जिम्मेदारी तय किए जाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह मामला केवल एक पुल का नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन के उपयोग और आम नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित विभाग इस मामले में क्या स्पष्टीकरण देता है, धंसाव के कारणों की जांच किस स्तर पर कराई जाती है और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।










