9 नवंबर विश्व उर्दू दिवस : बदहाली और सिमटते दायरे के लिए ज़िम्मेदार कौन?

MS Malik
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शिब्ली रामपुरी
मशहूर शायर डॉ इकबाल के जन्म दिवस के मौके पर हर साल 9 नवंबर को विश्व उर्दू दिवस मनाया जाता है.इस दौरान कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और कई संगठनों द्वारा उर्दू के शायरों.लेखकों पत्रकारों और शिक्षकों को सम्मान से नवाजा जाता है. उर्दू दिवस के मौके पर कार्यक्रम आयोजित कर उर्दू के खिदमतगारों को सम्मान से नवाजा जाना जहां बेहद ही खुशी की बात है वही एक बड़ी अफसोसनाक बात यह भी है कि उर्दू के नाम पर जितना शोर शराबा और हंगामा किया जाता है. दरअसल उर्दू के लिए बुनियादी तौर पर ऐसा कुछ होता नजर नहीं आता. यही कारण है कि आज उर्दू बदहाली की ओर बढ़ रही है और उर्दू का दायरा काफी सिमटता जा रहा है. उर्दू के नाम पर अधिकतर होने वाले कार्यक्रमों में सरकार को उर्दू की बदहाली और इसके सिमटते दायरे के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है लेकिन इस हकीकत को नजरअंदाज कर दिया जाता है कि उर्दू की बदहाली में उन लोगों का सबसे बड़ा रोल है कि जो लोग उर्दू के नाम पर शोर तो खूब मचाते हैं और कार्यक्रम भी आयोजित करते हैं लेकिन वास्तविक रूप से वह उर्दू की वह सेवा नहीं करते कि जिसकी उर्दू को आज जरूरत है।

यहां यह कहना भी गलत नहीं होगा कि कुछ चीज चंद लोग ऐसे हैं जो सिर्फ कुछ किताबें वग़ैरा लिखकर या कुछ समाचार पत्रों में कभी कभी कोई आर्टिकल वगैरह लिखकर यह समझ लेते हैं कि हमने उर्दू का पूरी तरह से फ़र्ज़ अदा कर दिया है जबकि यह वास्तविकता नहीं है. ऐसा करके वह सिर्फ अपने नाम और खुद को चमकाने की कोशिश करते हैं जिसे सीधे शब्दों में पब्लिसिटी कहा जाता है और शोहरत हासिल करना भी कह सकते हैं.आज उर्दू की सेवा के दो बड़े माध्यम हमारे सामने मौजूद हैं. एक है उर्दू के समाचार पत्र और दूसरे हैं मुशायरे-

जहां तक उर्दू के समाचार पत्रों की बात है तो आज देश के कई ऐसे नामचीन उर्दू समाचार पत्र बंद हो चुके हैं या फिर बंद होने के कगार पर हैं जो वास्तविक तौर पर उर्दू की सेवा कर रहे हैं दूसरी ओर जहां तक मुशायरों की बात है तो अधिकतर मुशायरों में उर्दू की सेवा कितनी होती है यह मुशायरों से ताल्लुक रखने वाले और मुशायरों में जाने वाले लोग बाखूबी जानते हैं. ऐसा नहीं है कि सभी लोग उर्दू के नाम पर सिर्फ शोर-शराबा ही करते हैं ऐसे लोग भी हैं कि जो वास्तविक तौर पर उर्दू की दिल से सेवा करते हैं मगर ऐसे लोग ना के बराबर हैं. इसका प्रमुख कारण यह है कि जो उर्दू के नाम पर शोर शराबा करके अपनी जेबें गर्म करते हैं वह उर्दू के सच्चे खिदमतगारों को कभी आगे ही आने नहीं देते और ऐसे ही लोगों का वर्चस्व हमेशा से कार्यक्रमों पर बना रहता है. मुशायरों में भी कुछ चंद शायरों का वर्चस्व कायम है और वह अपने सामने उभरते नए शायरों को आना पसंद नहीं करते यह कड़वी सच्चाई है. ऐसा ही कुछ उर्दू के नाम पर बने संगठनों में होता दिखाई देता है कि जहां पर कुछ चंद लोगों ने अपना डेरा जमा रखा है और वह उर्दू के नाम पर अपनी जेबें गर्म करने तक से पीछे नहीं रहते. ऐसा नहीं है कि ऐसा किसी एक जगह हो बल्कि कई जगहों पर ऐसे लोग हैं कि जिन का काम उर्दू के नाम पर शोर शराबा से लेकर घड़ियाली आंसू बहाना और अपनी जेबें गर्म करना है।

ऐसे में सीधा सवाल है कि क्या उर्दू को उसका वह स्थान मिल सकता है कि जिसकी वह वास्तविक रूप से हकदार है और क्या सिर्फ सरकार को उर्दू की बदहाली के लिए जिम्मेदार ठहराने से उर्दू की बदहाली दूर हो सकती है. यदि इसका जवाब तलाश किया जाए तो हकीकत यही सामने आएगी कि उर्दू के लिए सिर्फ सरकार को जिम्मेदार ठहराने भर से कुछ नहीं होगा बल्कि उर्दू के लिए बुनियादी तौर पर कार्य करने की जरूरत है. उर्दू के लिए कोई एक दिन विशेष नहीं रखा जा सकता इसके लिए जरूरत यह है कि हर रोज उर्दू की सेवा किसी ना किसी तरह से की जानी चाहिए. इसके लिए मुशायरे भी जरूरी है तो वहीं उर्दू समाचार पत्रों का लगातार प्रकाशन और उर्दू से युवा पीढ़ी को जोड़ना वक्त की सबसे बड़ी जरूरतों में शुमार किया जाना चाहिए साथ ही वरिष्ठ लेखकों और शायरों का भी एक कर्तव्य बनता है कि वह युवा पीढ़ी को सामने लाएं और उनको उर्दू से वाक़िफ़ कराएं और उनको वह मान सम्मान दे कि जिसके वो हकदार हैं इससे उर्दू का ख़राब दौर जरूर समाप्त होगा और उर्दू फिर से बुलंदियों पर पहुंचने में कामयाब होगी. उर्दू के सच्चे खिदमतगारों में उर्दू पत्रकारों का भी शुमार होता है. इसलिए जरूरी है कि हर शहर और क़स्बों से ताल्लुक रखने वाले उर्दू पत्रकारों को भी समय-समय पर सम्मानित किया जाना चाहिए. क्योंकि जो सेवा मौजूदा वक्त में उर्दू के पत्रकार कर रहे हैं वह दूसरे लोग बहुत ही कमी के साथ करते नजर आते हैं यह अलग बात है कि दूसरे लोग उर्दू के नाम पर शोर ज्यादा मचाते हैं।

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