SIR; मतदाता का डर और लोकतंत्र की परीक्षा

Astitva Times Desk
7 Min Read

 

क्या उत्तराखंड में SIR प्रक्रिया आम मतदाता के भरोसे की भी परीक्षा बन रही है?

उत्तराखंड में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाना बताया जा रहा है। लोकतंत्र में यह एक आवश्यक प्रक्रिया है। मृत व्यक्तियों के नाम हटाना, डुप्लिकेट प्रविष्टियों की पहचान करना और नए पात्र मतदाताओं को जोड़ना चुनावी व्यवस्था को मजबूत बनाता है। लेकिन इस प्रक्रिया के बीच एक ऐसा सवाल उभरकर सामने आया है जिसने हजारों सामान्य मतदाताओं को चिंता में डाल दिया है।

सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि बड़ी संख्या में लोगों को नाम में मामूली अंतर, वर्तनी की त्रुटि, सरनेम जुड़ने या छूटने, अथवा दस्तावेजों में दर्ज नाम और मतदाता सूची में दर्ज नाम के बीच छोटे-छोटे अंतर के आधार पर नोटिस प्राप्त हो रहे हैं। यही वह बिंदु है जिसने आम मतदाता के मन में सबसे बड़ा डर पैदा किया है।

क्या एक अक्षर की गलती से खतरे में पड़ सकता है वोट?
गांवों, कस्बों और शहरों में अनेक ऐसे उदाहरण सामने आ रहे हैं जहाँ किसी व्यक्ति के नाम के आगे “सिंह”, “देवी”, “चंद”, “दास” या अन्य उपनाम कहीं दर्ज हैं और कहीं नहीं। किसी दस्तावेज़ में “महेन्द्र” लिखा है तो दूसरे में “महेंद्र”। कहीं “प्रकाश चंद्र” है तो कहीं “प्रकाश चन्द्र”।
ऐसे मामलों में लोगों का सबसे बड़ा सवाल है—क्या वर्षों से मतदान कर रहा व्यक्ति केवल इसलिए संदेह के घेरे में आ सकता है क्योंकि उसके नाम की वर्तनी अलग-अलग दस्तावेज़ों में एक जैसी नहीं है?
यही वह चिंता है जिसे प्रशासन और निर्वाचन तंत्र को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है।

उत्तराखंड में नामों की वर्तनी और उपनामों में अंतर कोई असामान्य बात नहीं है। पहाड़ी क्षेत्रों में अनेक लोगों के नाम समय-समय पर अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड में अलग रूप में दर्ज हुए हैं। पुराने स्कूल प्रमाणपत्रों, राशन कार्डों, भूमि अभिलेखों और आधुनिक डिजिटल दस्तावेज़ों में अक्सर छोटे अंतर दिखाई देते हैं।
विशेष रूप से बुजुर्ग नागरिकों के मामले में यह स्थिति और अधिक सामान्य है। कई लोगों के जन्म का औपचारिक पंजीकरण दशकों पहले व्यवस्थित रूप से नहीं हुआ था। परिणामस्वरूप अलग-अलग दस्तावेज़ों में नाम और जन्मतिथि में छोटे अंतर मिलना अस्वाभाविक नहीं है।

आम मतदाता की चिंता क्या है?
सामान्य नागरिक की चिंता नागरिकता को लेकर नहीं है। उसकी चिंता यह है कि कहीं रिकॉर्ड की छोटी त्रुटि उसे मतदान के अधिकार से वंचित न कर दे। एक बुजुर्ग महिला जो पिछले 40 वर्षों से मतदान कर रही है, यदि उसे यह बताया जाए कि उसके नाम में दर्ज एक शब्द की भिन्नता के कारण सत्यापन होगा, तो स्वाभाविक रूप से उसके मन में आशंका पैदा होगी।एक प्रवासी श्रमिक जो वर्षों से मतदाता सूची में दर्ज है, यदि उसे केवल इसलिए नोटिस मिले कि उसके एक दस्तावेज़ में सरनेम दर्ज है और दूसरे में नहीं, तो उसका चिंतित होना स्वाभाविक है।

कानून क्या कहता है?
यहीं पर कानून और प्रशासनिक प्रक्रिया को समझना आवश्यक है।
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 19 मतदाता बनने की मूल शर्तें निर्धारित करती है—भारतीय नागरिकता, 18 वर्ष की आयु और संबंधित क्षेत्र में सामान्य निवास।

धारा 22 निर्वाचन अधिकारियों को मतदाता सूची में त्रुटियों को सुधारने का अधिकार देती है। इस धारा की मूल भावना यह है कि रिकॉर्ड में गलती होने पर सुधार किया जाए।
धारा 23 पात्र नागरिक को मतदाता सूची में नाम शामिल कराने या पुनः दर्ज कराने का अधिकार देती है।
इन प्रावधानों से स्पष्ट है कि कानून की मंशा छोटे रिकॉर्ड अंतर के कारण पात्र मतदाताओं को बाहर करना नहीं, बल्कि सही जानकारी के साथ उन्हें सूची में बनाए रखना है।

लोकतंत्र में संदेह नहीं, भरोसा पैदा होना चाहिए
यदि बड़ी संख्या में नोटिस ऐसे मामलों में जारी हो रहे हैं जहाँ विवाद केवल नाम की वर्तनी, उपनाम या मामूली दस्तावेजी अंतर का है, तो प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
लोगों को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि:
केवल स्पेलिंग की छोटी गलती से नाम नहीं कटता।
सरनेम जुड़ने या हटने मात्र से नागरिकता संदिग्ध नहीं हो जाती।
मतदाता को अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा।
रिकॉर्ड सुधार की व्यवस्था उपलब्ध है।
पात्र मतदाता के अधिकारों की रक्षा कानून करता है।
जब तक यह संदेश स्पष्ट रूप से जनता तक नहीं पहुँचेगा, तब तक अफवाहें और भय दोनों बढ़ते रहेंगे।

सबसे बड़ी चुनौती: नही छूटे एक भी पात्र मतदाता का नाम
मतदाता सूची को शुद्ध बनाना आवश्यक है, लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी यह है कि कोई पात्र नागरिक अनजाने में सूची से बाहर न हो जाए।
एक मृत व्यक्ति का नाम सूची में रह जाना प्रशासनिक गलती हो सकती है, लेकिन एक जीवित और पात्र नागरिक का नाम सूची से हट जाना लोकतांत्रिक दृष्टि से कहीं अधिक गंभीर समस्या है। इसीलिए SIR प्रक्रिया की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि कितने नामों का सत्यापन हुआ, बल्कि इस बात से भी मापी जाएगी कि कितने पात्र मतदाताओं का भरोसा कायम रहा।

कुल मिलाकर उत्तराखंड में चल रही SIR प्रक्रिया चुनावी शुद्धता और लोकतांत्रिक विश्वास, दोनों की परीक्षा है। यदि अधिकांश नोटिस वास्तव में नाम की मामूली त्रुटियों, वर्तनी के अंतर या सरनेम जुड़ने-छूटने जैसे मामलों से जुड़े हैं, तो जनता को आश्वस्त करना चुनावी प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। जिसके लिए लगातार अधिकारी काम कर भी रहे हैं। लोकतंत्र की आत्मा यह नहीं कहती कि एक अक्षर की गलती से नागरिक की आवाज़ कमजोर हो जाए। लोकतंत्र की आत्मा यह कहती है कि हर पात्र नागरिक को सुना जाए, उसे सुधार का अवसर मिले और उसका वोट सुरक्षित रहे।

आख़िरकार, मतदाता सूची का उद्देश्य नाम हटाना नहीं, बल्कि लोकतंत्र में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना है।

 

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!