दून में एक ही जमीन का कई बार सौदा, पुलिस ने तीन लोगों के खिलाफ किया मुकदमा दर्ज

Astitva Times Desk
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डोम गांव की बेशकीमती जमीनों की खरीद-फरोख्त पर उठे गंभीर सवाल, 43 रजिस्ट्रियों का शिकायत में उल्लेख; बैंक लेनदेन, मुख्तारनामे और राजस्व अभिलेखों की गहन जांच की मांग

देहरादून। राजधानी देहरादून के राजपुर थाना क्षेत्र स्थित डोम गांव में बेशकीमती जमीनों की खरीद-फरोख्त से जुड़ा कथित धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश का मामला सामने आने के बाद पुलिस महकमे में हलचल तेज हो गई है। जमीनों के कथित दोहरे सौदों, एक ही संपत्ति से संबंधित अलग -अलग खरीदारों के अधिकारों और करोड़ों रुपये मूल्य की जमीनों के लेनदेन को लेकर उठे गंभीर सवालों के बीच देहरादून पुलिस ने तीन लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। मामले में सरदार हरजिंदर पाल सिंह बंगा, परमीत सिंह उर्फ पम्मी और कुंवर जावेद राव के नाम सामने आए हैं। अब पुलिस जांच में यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि विवादित जमीनों की खरीद- फरोख्त और बाद के कथित सौदों में संबंधित व्यक्तियों की क्या भूमिका रही।

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, देहरादून को दी गई शिकायत के आधार पर दर्ज इस प्रकरण में पीपल मंडी, देहरादून निवासी अंकित अग्रवाल ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता डॉ. नितिन कुमार गुप्ता के माध्यम से प्रस्तुत शिकायत के अनुसार, जमीन के मूल स्वामी हरजिंदर पाल सिंह बंगा ने विभिन्न खरीदारों से बैंक खातों के माध्यम से आरटीजीएस द्वारा भुगतान प्राप्त किया और उनके पक्ष में जमीनों की रजिस्ट्रियां निष्पादित की। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि इन रजिस्ट्रियों के बाद कुंवर जावेद राव के पक्ष में सामान्य मुख्तारनामा निष्पादित किया गया। इसके बाद उसी जमीन से संबंधित अन्य लोगों के पक्ष में भी सौदे किए जाने के आरोप हैं। यदि जांच में इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह मामला जमीनों के स्वामित्व, पंजीकृत दस्तावेजों की वैधता और अलग-अलग खरीदारों के संपत्ति अधिकारों से जुड़े गंभीर विवाद का रूप ले सकता है।

शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि जमीन खरीदने के लिए भुगतान करने और रजिस्ट्री कराने के बावजूद कई खरीदारों के अधिकार विवादों में घिर गए हैं। इतना ही नहीं, शिकायत में यह भी दावा किया गया है कि कुछ खरीदारों पर अपनी खरीदी हुई जमीन वापस बेचने का दबाव बनाया जा रहा है। इन आरोपों की सच्चाई और इसके पीछे की परिस्थितियों का खुलासा पुलिस जांच के बाद ही हो सकेगा।

दिल्ली की आर्थिक अपराध शाखा में भी दर्ज है प्राथमिकी
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिकायत के अनुसार, प्रकरण में दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा, मंदिर मार्ग में पहले से प्राथमिकी दर्ज है।शिकायतकर्ता ने लगभग 43 रजिस्ट्रियों और उनसे संबंधित खरीदारों का विवरण शामिल होने की बात कही है। शिकायत में कुंवर जावेद राव को मुख्य आरोपी के रूप में उल्लेखित किए जाने का भी दावा किया गया है।शिकायतकर्ता पक्ष की आशंका है कि यदि जमीन के मूल स्वामी और अन्य संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की समुचित पड़ताल नहीं की गई, तो मामले की जांच अधूरी रह सकती है। इसी आधार पर सभी संबंधित व्यक्तियों, दस्तावेजों और वित्तीय लेनदेन की व्यापक जांच की आवश्यकता जताई गई है।
हालांकि, दिल्ली में दर्ज प्राथमिकी, उसमें शामिल आरोपों और दोनों स्थानों पर चल रही संभावित जांच के बीच वास्तविक संबंधों की पुष्टि संबंधित पुलिस अभिलेखों से होना आवश्यक है।

डोम गांव की जमीनें और देहरादून के अभिलेख जांच के केंद्र में
शिकायतकर्ताओं ने मामले की जांच देहरादून में कराए जाने की मांग करते हुए तर्क दिया है कि विवादित जमीनें, संबंधित उप-पंजीयक कार्यालय के दस्तावेज, राजस्व अभिलेख, गवाह और अधिकांश खरीदार देहरादून जिले में ही स्थित हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर दस्तावेजों की जांच और संबंधित पक्षों के बयान दर्ज करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शिकायत में खसरा संख्या 325, 343, 368 और 370 सहित अन्य भूमि अभिलेखों का उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि दिल्ली की आर्थिक अपराध शाखा के समक्ष बार-बार उपस्थित होने से खरीदारों को अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनका आग्रह है कि जमीनों से संबंधित मूल दस्तावेजों और स्थानीय राजस्व रिकॉर्ड की जांच देहरादून में प्रभावी ढंग से की जाए, ताकि संपत्तियों की वास्तविक स्थिति और विभिन्न दस्तावेजों के बीच संभावित विसंगतियों का पता लगाया जा सके।

43 रजिस्ट्रियों की जांच से खुल सकते हैं कई अहम पहलू
शिकायत में लगभग 43 रजिस्ट्रियों का उल्लेख इस पूरे प्रकरण को और महत्वपूर्ण बनाता है। अब जांच के दौरान यह पड़ताल करना आवश्यक होगा कि संबंधित जमीनों की रजिस्ट्रियां किन तिथियों पर हुईं, प्रत्येक सौदे के लिए कितना भुगतान किया गया, रकम किन बैंक खातों में जमा हुई और बाद में निष्पादित मुख्तारनामों के आधार पर किस प्रकार के अधिकार दिए गए। इसके साथ ही यह भी जांच का विषय होगा कि क्या एक ही भूमि के संबंध में अलग-अलग व्यक्तियों के पक्ष में परस्पर विरोधी दस्तावेज निष्पादित किए गए, संबंधित खरीदारों को जमीन के स्वामित्व और पूर्व में हुए सौदों की जानकारी थी या नहीं तथा राजस्व अभिलेखों में भूमि की स्थिति क्या दर्शाई गई है। इन सवालों के जवाब बैंकिंग रिकॉर्ड, पंजीकृत दस्तावेजों, मुख्तारनामों, राजस्व अभिलेखों और संबंधित पक्षों के बयानों के मिलान से ही सामने आ सकेंगे। केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी निर्धारित नहीं की जा सकती।

खरीदारों को अपने संपत्ति अधिकार सुरक्षित होने की उम्मीद
पीड़ित खरीदारों ने मांग की है कि सभी संबंधित रजिस्ट्रियों, मुख्तारनामों, बैंक लेनदेन और राजस्व अभिलेखों की निष्पक्ष एवं गहन जांच की जाए। उनका कहना है कि जांच का दायरा सभी संबंधित व्यक्तियों और लेनदेन तक विस्तारित होना चाहिए, ताकि कथित दोहरे सौदों की वास्तविकता स्पष्ट हो सके और प्रभावित खरीदारों के हितों की रक्षा के लिए कानून के अनुरूप कदम उठाए जा सकें। जमीनों की खरीद-फरोख्त से जुड़े ऐसे विवादों में दस्तावेजों की प्रमाणिकता, भुगतान का सत्यापन और संपत्ति के वास्तविक स्वामित्व की स्थिति निर्णायक महत्व रखती है। ऐसे में जांच के निष्कर्ष न केवल शिकायतकर्ताओं की ओर से लगाए गए आरोपों की सच्चाई स्पष्ट करने में अहम होंगे, बल्कि विवादित संपत्तियों से जुड़े अधिकारों की स्थिति समझने में भी मददगार साबित हो सकते हैं।

अब जांच पर टिकी निगाहें
मुकदमा दर्ज होने के बाद अब पूरे मामले में देहरादून पुलिस की जांच महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है। जांच के दौरान यह स्पष्ट होना बाकी है कि जमीनों के कथित दोहरे सौदों में किन व्यक्तियों की क्या भूमिका रही, बैंक खातों के माध्यम से हुए लेनदेन का दस्तावेजों से कितना मेल बैठता है और मुख्तारनामों के आधार पर किए गए कार्य कानून के अनुरूप थे या नहीं।
फिलहाल इस मामले में सामने आए आरोप शिकायतकर्ता पक्ष के दावों पर आधारित हैं। आरोपों की पुष्टि, संबंधित व्यक्तियों की जिम्मेदारी और संपत्तियों के वास्तविक अधिकारों का निर्धारण जांच के निष्कर्षों तथा उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर ही किया जा सकेगा। अब देखना होगा कि पुलिस जांच में इस कथित जमीन प्रकरण से जुड़े कौन-कौन से तथ्य सामने आते हैं और प्रभावित खरीदारों की शिकायतों पर आगे क्या कानूनी कार्रवाई होती है।

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