करोड़ों परिवारों को झटका; उज्ज्वला योजना के सिलेंडरों में भारी कटौती अब साल में मिलेंगे सिर्फ चार सिलेंडर

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उज्ज्वला योजना के सिलेंडरों में एक बार फिर हुई कटौती के बाद बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या फिर चूल्हे की ओर लौटेंगे गरीब परिवार? पहले 12 फिर 9 और अब 4 रह गई सब्सिडी वाले सिलेंडर की संख्या।

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) को मोदी सरकार की सबसे चर्चित और महत्वाकांक्षी योजना बताई गई थी, जिसे वर्ष 2016 में शुरू किया गया था। इस योजना का उद्देश्य गरीब परिवारों खासकर ग्रामीण महिलाओं को धुएं वाले चूल्हों से मुक्ति दिलाकर स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराना था। लेकिन अब केंद्र सरकार के एक नए फैसले ने योजना के लाखों लाभार्थियों की चिंता बढ़ा दी है। सरकार ने उज्ज्वला योजना के तहत सब्सिडी वाले गैस सिलेंडरों की संख्या घटाकर 9 से सिर्फ 4 कर दी है। यानी अब लाभार्थियों को साल में केवल पहले 4 सिलेंडरों पर ही 300 रुपये प्रति सिलेंडर की सब्सिडी मिलेगी। इसके बाद लिए जाने वाले सभी सिलेंडरों के लिए पूरी कीमत चुकानी होगी। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और आम परिवार पहले से ही महंगाई का दबाव झेल रहे हैं।

सरकार के नए नियमों के अनुसार उज्ज्वला लाभार्थियों को पहले की तरह 300 रुपये प्रति सिलेंडर की सब्सिडी मिलती रहेगी, लेकिन यह लाभ अब केवल साल के पहले 4 सिलेंडरों तक सीमित रहेगा। पांचवें सिलेंडर से लाभार्थियों को बिना किसी सब्सिडी के बाजार मूल्य चुकाना होगा। उदाहरण के लिए दिल्ली में 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत हालिया बढ़ोतरी के बाद 942 रुपये पहुंच गई है। ऐसे में सब्सिडी मिलने पर उज्ज्वला लाभार्थी पहले चार सिलेंडर 642 रुपये में प्राप्त कर सकेंगे, लेकिन उसके बाद उन्हें पूरी कीमत देनी होगी।

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अनुसार यह फैसला लाभार्थियों की औसत सालाना खपत को ध्यान में रखकर लिया गया है। सरकार का दावा है कि अधिकांश उज्ज्वला उपभोक्ता साल में औसतन चार सिलेंडर ही इस्तेमाल करते हैं, इसलिए सब्सिडी का दायरा उसी के अनुरूप तय किया गया है।सरकार का यह भी कहना है कि एक सिलेंडर की वास्तविक आपूर्ति लागत लगभग 1,600 रुपये तक पहुंचती है, जबकि लाभार्थियों को विभिन्न माध्यमों से करीब 1,000 रुपये तक की सहायता मिल जाती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनावों का हवाला देते हुए सरकार का कहना है कि भारत में घरेलू गैस की कीमतें अब भी कई देशों की तुलना में कम हैं।

भले ही सरकार इसे औसत खपत के आधार पर लिया गया फैसला बता रही है, लेकिन इस निर्णय ने उज्ज्वला योजना के मूल उद्देश्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। जब योजना की शुरुआत हुई थी तब लाभार्थियों को साल में 12 सब्सिडी वाले सिलेंडर मिलते थे। बाद में यह संख्या घटाकर 9 कर दी गई और अब केवल 4 रह गई है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या योजना धीरे-धीरे अपने शुरुआती स्वरूप से दूर होती जा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में कई परिवार ऐसे हैं जिनकी सालाना खपत चार सिलेंडर से अधिक होती है। ऐसे परिवारों को अब अतिरिक्त सिलेंडर बाजार मूल्य पर खरीदने पड़ेंगे, जिससे उनके घरेलू बजट पर सीधा असर पड़ सकता है।

क्या फिर चूल्हे की ओर लौटेंगे गरीब परिवार?
ऊर्जा क्षेत्र के जानकार लंबे समय से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि केवल गैस कनेक्शन देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि परिवार नियमित रूप से रिफिल करा सकें। यदि गैस भरवाने की लागत बढ़ती है और सब्सिडी का लाभ सीमित होता जाता है, तो आशंका है कि कुछ गरीब परिवार फिर से लकड़ी, उपले या अन्य पारंपरिक ईंधनों का इस्तेमाल बढ़ा सकते हैं। ऐसा होने पर उज्ज्वला योजना के तहत महिलाओं के स्वास्थ्य और स्वच्छ ईंधन से जुड़े लक्ष्यों को भी झटका लग सकता है।