सहस्रधारा रोड की पुश्तैनी जमीन का मामला गरमाया, बिल्डर प्रदीप नागरथ और साथी केके सोईन की बढ़ीं मुश्किलें; 18 सितंबर को फिर होगी सुनवाई
देहरादून। राजधानी देहरादून में सहस्रधारा रोड क्षेत्र की पुश्तैनी जमीन को लेकर चल रहे विवाद में आरोपी बिल्डर प्रदीप नागरथ और उसके साथी केके साइन को अदालत से फिलहाल राहत नहीं मिली है। दोनों आरोपियों की ओर से गिरफ्तारी पर रोक लगाने और अग्रिम जमानत देने की मांग को लेकर दायर याचिकाओं को जिला एवं सत्र न्यायालय ने खारिज कर दिया। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए फिलहाल आरोपियों को अंतरिम अग्रिम जमानत देने से इनकार किया है। दोनों की अग्रिम जमानत याचिकाओं पर अब 18 सितंबर 2026 को फिर सुनवाई होगी।
पुश्तैनी जमीन को लेकर शुरू हुआ विवाद
मामला देहरादून के सहस्रधारा रोड क्षेत्र की पुश्तैनी जमीन से जुड़ा है। समाचार के अनुसार, इस जमीन को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। आरोप है कि मामले में आरोपी बिल्डर प्रदीप नागरथ और उसके साथी केके साइन की भूमिका सामने आई है और जमीन को अलग-अलग लोगों के पक्ष में बेचने का आरोप लगाया गया है।
मामले में आरोपियों ने गिरफ्तारी से बचने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उनकी ओर से अग्रिम जमानत के लिए याचिकाएं दाखिल की गई थीं। हालांकि अदालत ने तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए मामले की गंभीरता को ध्यान में रखा।
अभियोजन ने जमानत का किया जोरदार विरोध
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने आरोपों की गंभीरता का हवाला देते हुए अग्रिम जमानत का विरोध किया। जिला शासकीय अधिवक्ता जीपी रतूड़ी ने अदालत को बताया कि जमीन की बिक्री के लिए कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए थे। अभियोजन ने यह भी दलील दी कि मामला केवल जमीन के लेन-देन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें दस्तावेजों की सत्यता और जमीन के वास्तविक स्वामित्व से जुड़े गंभीर सवाल भी हैं।
अभियोजन की दलीलों के बाद अदालत ने आरोपियों को तत्काल अंतरिम राहत देना उचित नहीं समझा।
जमीन अलग-अलग लोगों के पक्ष में बेचने का आरोप
मामले में आरोप है कि विवादित जमीन का इस्तेमाल कर उसे अलग-अलग लोगों के पक्ष में बेचा गया। बचाव पक्ष की ओर से गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की गई थी, लेकिन अदालत ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों में बिना विस्तृत सुनवाई के आरोपियों को अंतरिम अग्रिम जमानत देने का पर्याप्त आधार फिलहाल नहीं बनता।
अदालत ने मामले की जांच कर रहे विवेचक से विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी है। इससे साफ है कि न्यायालय पूरे प्रकरण की तह तक पहुंचने के लिए जांच की प्रगति और सामने आए तथ्यों को गंभीरता से परख रहा है।
18 सितंबर को तय होगा अगला रुख
अदालत ने दोनों आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिकाओं पर अगली सुनवाई के लिए 18 सितंबर 2026 की तारीख तय की है। तब तक जांच से जुड़े तथ्यों और विवेचक की रिपोर्ट भी सामने आने की उम्मीद है।
फिलहाल अदालत के इस रुख से आरोपियों की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। वहीं, जमीन से जुड़े इस विवाद ने एक बार फिर पुश्तैनी संपत्तियों के दस्तावेज, फर्जी कागजात और जमीन की खरीद-फरोख्त में बरती जाने वाली सावधानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

देहरादून। राजधानी देहरादून का सहस्रधारा रोड और उसके आसपास का क्षेत्र भूमि घोटालों को लेकर सुर्खियों में है। तरला नागल स्थित करोड़ों रुपये मूल्य की 18 बीघा कीमती भूमि को फर्जी वारिस और कूटरचित (जाली) दस्तावेजों के दम पर बेचने के बहुचर्चित मामले में राजपुर थाना पुलिस ने आखिरकार बड़ी कार्रवाई की है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के कड़े आदेश और तल्ख टिप्पणियों के बाद पुलिस ने ‘दून वैली कोलोनाइजर एंड बिल्डर’ कंपनी के निदेशक प्रदीप नागरथ और के.के. सोइन के खिलाफ जालसाजी, धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश की संगीन धाराओं में नामजद मुकदमा पंजीकृत कर लिया है।
1996 में मौत, 2001 में समझौता
इस पूरे मामले की परतें तब खुलीं जब पीड़ित तरला नागल निवासी नूर हसन ने दस्तावेज एकत्र कर कानूनी लड़ाई शुरू की।
मूल मालिक की मृत्यु: जमीन के वास्तविक स्वामी और पीड़ित के पूर्वज करीमुद्दीन की मृत्यु वर्ष 1996 में ही हो चुकी थी।
निष्प्रभावी पावर ऑफ अटॉर्नी का खेल: आरोपी के.के. सोइन के पास करीमुद्दीन द्वारा वर्ष 1990 में दी गई एक पावर ऑफ अटॉर्नी थी, जो कानूनन करीमुद्दीन की मृत्यु (1996) के साथ ही स्वतः रद्द (निष्प्रभावी) हो चुकी थी।
अपंजीकृत MoU और फर्जी बिक्री: इस तथ्य को छिपाते हुए, आरोपी सोइन ने करीमुद्दीन की मौत के 5 साल बाद 19 जुलाई 2001 को दून वैली बिल्डर के निदेशक प्रदीप नागरथ के साथ एक अपंजीकृत (unregistered) समझौता पत्र (MoU) तैयार कर लिया।
एकल मध्यस्थता (Sole Arbitration) का सहारा: आरोपियों ने सोची-समझी साजिश के तहत एक फर्जी एकल मध्यस्थता केस दायर कराया और पीड़ित नूर हसन व उनके परिवार के हिस्से की 18 बीघा जमीन के कूटरचित विक्रय पत्र (Sale Deeds) तैयार कराकर जमीन को बाजार में ऊंचे दामों पर बेच दिया।
पीड़ित नूर हसन द्वारा मीडिया को साझा की गई जानकारी के अनुसार उन्होंने इस संगठित भू-माफिया तंत्र के खिलाफ हर स्तर पर शिकायत दर्ज कराई थी। क्षेत्राधिकारी (CO) मसूरी ने 21 अक्टूबर 2024 को अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट में स्पष्ट कर दिया था कि यह मामला पूरी तरह से फर्जी दस्तावेजों और धोखाधड़ी पर आधारित है। इसके बावजूद पुलिस महीनों तक एफआईआर दर्ज करने से बचती रही। जब पीड़ित ने एसएसपी कार्यालय और निचली अदालत का दरवाजा खटखटाया, तो वहां से भी प्रार्थना पत्र खारिज हो गया। अंततः पीड़ित ने हाईकोर्ट (नैनीताल) की शरण ली। हाईकोर्ट ने देहरादून पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल खड़े करते हुए पुलिस को बिना किसी देरी के तुरंत मुकदमा दर्ज कर आरोपियों के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई करने का आदेश जारी किया।
आम निवेशकों और प्लॉट धारकों में मचा हड़कंप
राजपुर थाना प्रभारी के अनुसार उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में दोनों नामजद आरोपियों के खिलाफ संबंधित धाराओं में मामला दर्ज कर लिया गया है और पुलिस अब दस्तावेजों की फॉरेंसिक व कानूनी जांच कर रही है। इस एफआईआर के सार्वजनिक होते ही हड़कंप मच गया है। जिस 18 बीघा जमीन पर फर्जी विक्रय पत्रों के जरिए प्लॉटिंग कर आम लोगों को जमीन बेची गई थी, उस पर अब गहरा कानूनी संकट मंडराने लगा है। जिन लोगों ने गाढ़े पसीने की कमाई लगाकर वहां भूखंड या निर्माण खरीदा था, वे अब अपनी गाढ़ी कमाई को लेकर खासे चिंतित हैं।