15 दस्तावेज भी नहीं बचा सके नागरिकता का दावा, हाईकोर्ट ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल का फैसला बरकरार रखा

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नई दिल्ली। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम के एक निवासी को विदेशी घोषित करने वाले फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (Foreigners Tribunal) के आदेश को बरकरार रखते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि नागरिकता संबंधी मामलों में केवल बड़ी संख्या में दस्तावेज प्रस्तुत कर देना पर्याप्त नहीं होता। कानून के अनुसार संबंधित व्यक्ति पर यह दायित्व होता है कि वह विश्वसनीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्यों के आधार पर यह साबित करे कि वह भारतीय नागरिक है। यदि वह ऐसा करने में असफल रहता है तो ट्रिब्यूनल के निष्कर्षों में अदालत हस्तक्षेप नहीं करेगी। यह फैसला न्यायमूर्ति कल्याण राय सुराना और न्यायमूर्ति शमीमा जहां की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने फॉरेनर्स एक्ट, 1946 की धारा 9 का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति पर विदेशी होने का संदेह होने की स्थिति में यह साबित करने का कानूनी दायित्व उसी व्यक्ति पर होता है कि वह विदेशी नहीं, बल्कि भारत का नागरिक है।

क्या था मामला?
मामला असम के एक निवासी से जुड़ा है, जिसे फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर विदेशी घोषित कर दिया था। ट्रिब्यूनल के इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने गुवाहाटी हाई कोर्ट का रुख किया और दावा किया कि वह जन्म से भारतीय नागरिक है। अपनी बात के समर्थन में उसने कई सरकारी एवं शैक्षणिक दस्तावेज अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि उसके द्वारा पेश किए गए दस्तावेज उसकी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त हैं और ट्रिब्यूनल ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया।

कौन-कौन से दस्तावेज पेश किए गए?
याचिकाकर्ता ने कुल 15 दस्तावेज अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए। इनमें प्रमुख रूप से—
1951 के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) की प्रविष्टि,
विभिन्न वर्षों की मतदाता सूचियां,
स्कूल प्रमाणपत्र,
पैन (PAN) कार्ड,
मतदाता पहचान पत्र (Voter ID),
तथा अन्य सरकारी रिकॉर्ड शामिल थे। याचिकाकर्ता का कहना था कि इन दस्तावेजों से स्पष्ट होता है कि उसका परिवार लंबे समय से भारत में रह रहा है और वह भारतीय नागरिक है।

अदालत ने क्यों नहीं माना दावा?
हाई कोर्ट ने सभी दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद कहा कि नागरिकता संबंधी मामलों में केवल दस्तावेजों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी विश्वसनीयता, वैधानिक स्वीकार्यता और आपसी संबंध (Linkage Evidence) सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यह स्थापित नहीं कर सका कि प्रस्तुत दस्तावेजों के आधार पर उसका संबंध उन पूर्वजों से स्पष्ट और कानूनी रूप से सिद्ध होता है, जिनके आधार पर वह भारतीय नागरिकता का दावा कर रहा था। पीठ ने कहा कि यदि दस्तावेजों के बीच आवश्यक कड़ी (Linkage) स्थापित नहीं होती या उनमें विरोधाभास अथवा कानूनी कमियां पाई जाती हैं, तो केवल दस्तावेज प्रस्तुत कर देने से नागरिकता स्वतः सिद्ध नहीं हो जाती।

धारा 9 का क्या है महत्व?
फैसले में अदालत ने फॉरेनर्स एक्ट, 1946 की धारा 9 का विस्तार से उल्लेख किया। इस प्रावधान के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर प्रश्न उठता है, तो यह जिम्मेदारी सरकार की नहीं बल्कि संबंधित व्यक्ति की होती है कि वह यह साबित करे कि वह विदेशी नहीं है। यानी सामान्य आपराधिक मामलों के विपरीत यहां Burden of Proof (प्रमाण का भार) संबंधित व्यक्ति पर होता है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता इस कानूनी दायित्व को पूरा करने में सफल नहीं हुआ।

ट्रिब्यूनल के आदेश में नहीं मिला हस्तक्षेप का आधार
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने उपलब्ध साक्ष्यों का समुचित परीक्षण किया था। रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया जिससे यह कहा जा सके कि ट्रिब्यूनल ने कानून का गलत प्रयोग किया या तथ्यों का गलत मूल्यांकन किया। इसी आधार पर अदालत ने ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखा और याचिका खारिज कर दी।

क्या PAN कार्ड और वोटर आईडी नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं?
इस फैसले को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह की चर्चाएं हुईं। हालांकि अदालत ने अपने निर्णय में यह नहीं कहा कि पैन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र या अन्य सरकारी दस्तावेज हमेशा नागरिकता साबित करने के लिए अमान्य होते हैं। अदालत का निष्कर्ष इस विशिष्ट मामले के तथ्यों और प्रस्तुत साक्ष्यों पर आधारित था। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए गए दस्तावेज इस मामले में नागरिकता सिद्ध करने के लिए आवश्यक कानूनी मानकों को पूरा नहीं कर सके।

असम में क्यों महत्वपूर्ण हैं ऐसे मामले?
असम में नागरिकता से जुड़े मामलों की सुनवाई फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा की जाती है। यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह उत्पन्न होता है, तो ट्रिब्यूनल उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देता है। ट्रिब्यूनल के आदेश को बाद में हाई कोर्ट और आवश्यक होने पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। गुवाहाटी हाई कोर्ट का यह फैसला एक बार फिर स्पष्ट करता है कि नागरिकता संबंधी मामलों में अदालतें केवल दस्तावेजों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी प्रमाणिकता, वैधानिक स्वीकार्यता और पारिवारिक संबंध स्थापित करने वाले साक्ष्यों की गुणवत्ता को प्राथमिकता देती हैं।

यह निर्णय नागरिकता संबंधी मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराता है कि फॉरेनर्स एक्ट, 1946 की धारा 9 के तहत नागरिकता साबित करने का दायित्व संबंधित व्यक्ति पर होता है। अदालत ने माना कि इस मामले में प्रस्तुत 15 दस्तावेज भी उस कानूनी मानक को पूरा नहीं कर सके, जिसके आधार पर याचिकाकर्ता को भारतीय नागरिक माना जा सके। इसलिए फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा उसे विदेशी घोषित करने का आदेश बरकरार रखा गया।