कानून वापसी बनाम स्थगन प्रस्ताव- कितना तर्कसंगत और कितना मुमकिन?

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कृषि कानून :-
तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसानों के सामने केंद्र सरकार ने डेढ़ से दो साल तक इन्हें स्थगित करने तक का प्रस्ताव रखा है, लेकिन किसान संगठन उसे खत्म करने से कम पर मानने को राजी नहीं हैं। किसान संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त समिति पर भी सवाल उठाए हैं।

संसदीय इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं, जब संसद ने कानूनों को निरस्त भी किया है। ऐसे भी उदाहरण हैं, जब सरकार ने दशकों तक संसद से पारित कानून को लागू ही नहीं किया और उसे लटकाए रही।

संसद को कानून बनाने और उसे ‘स्टैच्यू बुक’ से हटाने का अधिकार है। जानकारों के मुताबिक, सरकार किसी कानन को स्थगित रखने का अधिकार नहीं रखती। हां, एक संसद में पारित प्रस्ताव या अध्यादेश के जरिए कानूनों को निरस्त जरूर कर सकती है।

क्या है कानून लागू करने की प्रक्रिया :-

कानून पारित होने का आशय यह नहीं कि वह अगले ही दिन से लागू हो गया। कानून पारित होने के बाद उसे कार्यस्तर पर लागू करने के तीन चरण हैं। पहला कदम है, राष्ट्रपति की सहमति उस तारीख से कानून लागू हो जाएगा। उसके बाद सरकार कानून के नियमन तय करती है और फिर जमीनी स्तर पर उसे लागू करने के निर्देश जारी करती है। आमतौर पर राष्टपति संसद से मुहर लगने के कछ दिनों के भीतर मंजूरी दे देते हैं।

पिछली बार 2006 में ऐसा हुआ था कि तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने एक विधेयक को मंजूरी देने से रोक लिया था। यह विधेयक लाभ का पद (ऑफिस ऑफ प्रॉफिट) में फंसे सांसदों को उनकी सदस्यता खत्म किए जाने से रोकने के लिए था।

कृषि कानूनों की वैधानिक स्थिति :-

मौजूदा कृषि कानून संसद के दोनों सदनों से पिछले मानसून सत्र में सितंबर, 2020 में पारित हुआ था और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उसे हरी झंडी दिखा दी थी। लागू करने की तारीख पर फैसले के लिए कई मामलों में संसद के द्वारा सरकार को ही इसका अधिकार देने की परिपाटी रही है।

मौजदा कषि कानून पहले से ही लागू अध्यादेश के बदले में था। 2013 में भूमि अधिग्रहण कानून को लागू करने के लिए सरकार को तीन महीने का वक्त दिया गया था। ई-सिगरेट को पहले अध्यादेश के जरिए 18 सितंबर, 2019 से प्रतिबंधित किया गया, फिर उसे दो दिसंबर, 2019 को संसद से पास कानून से बदल दिया गया।

कानून जो लागू नहीं हुए :-

कई कानून वर्षों तक लागू ही नहीं हुए, इसके दो बेहतरीन उदाहरण हैं। राष्ट्रीय पर्यावरण न्यायाधिकरण अधिनियम और दिल्ली किराया नियंत्रण कानन को तत्कालीन पीवी नरसिम्हाराव सरकार ने ही पास करवाए थे। ये कानून 1995 में ही संसद से पास हो गए थे और राष्ट्रपति की भी मुहर लग गई थी, लेकिन सरकार ने इन्हें कभी लागू ही नहीं किया। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ऐक्ट ने आखिरकार 2010 में एनवॉयरमेंट ट्रिब्यूनल लॉ की जगह ले ली। दिल्ली किराया नियंत्रण कानून को भी निरस्त करने का विधेयक 2010 में पेश किया गया और यह अभी भी राज्यसभा में लटका हुआ है।

कानून के नियम बनाने की प्रक्रिया :-

संसद से जो विधेयक पास होता है, उसमें कानून की बारीकियां नहीं होती। उसका एक खाका होता है। सरकार उसे जमीन पर लाग करने के लिए नियम बनाती है और उसके लिए जरूरी मशीनरी तैयार करती है। बेनामी लेनदेन अधिनियम, 1988 नियमों के अभाव में कभी लागू ही नहीं हो सका। 25 वर्ष तक कानून लागू होने के बावजूद ऐसी बेनामी संपत्तियां जब्ती से बची रह गई। आखिरकार 2016 में इस कानून को संसद ने निरस्त किया। 2019 के दिसंबर में पास नागरिकता संशोधन कानून के नियम नहीं बने हैं।

कितने दिन में नियम बनने चाहिए :-

संसद ने सुझाव दिया है कि सरकार को कानून बनाए जाने के छह महीने के भीतर नियम तय करने चाहिए। लेकिन कई संसदीय समितियों ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि नियम तय करने की सिफारिशों पर विभिन्न मंत्रालय बैठे रहते हैं।

इस तरह से सरकार जो कानून बनाती है, उन्हें सरकार तंत्र चाहे तो ठंडे बस्ते में डाले रह सकता है। कृषि कानूनों को लेकर अध्यादेश पांच जून, 2020 को लाए गए और सरकार ने कुछ नियम अक्तूबर 2020 में बनाए और इन्हें कानूनों की शक्ल दे दी।

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