15 मीटर की दूरी से दोनों पैरों में गोली! कथित एनकाउंटर पर हाईकोर्ट ने दिया CBI जांच का आदेश

Astitva Times Desk
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23 पुलिसकर्मियों से घिरे आरोपी की फायरिंग में एक भी पुलिसकर्मी घायल नहीं हुआ, फिर रात के अंधेरे में SHO की गोलियां दोनों पैरों में कैसे लगीं? हाईकोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल; तत्कालीन SHO अश्वनी कुमार दुबे की शूटिंग क्षमता की भी होगी जांच

लखनऊ। श्रावस्ती जिले में वर्ष 2025 में हुए छुटकउ उर्फ अलाउद्दीन के कथित पुलिस एनकाउंटर ने अब एक नया और बेहद गंभीर मोड़ ले लिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने मामले की परिस्थितियों पर सवाल उठाते हुए इसकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराने का आदेश दिया है। अदालत ने न केवल कथित मुठभेड़ की पूरी परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच के निर्देश दिए हैं, बल्कि उस पुलिस अधिकारी की शूटिंग क्षमता की भी जांच कराने को कहा है, जिसके बारे में कहा गया है कि उसने रात के अंधेरे में लगभग 15 मीटर की दूरी से आरोपी के दोनों पैरों पर गोलियां चलाई थीं।

न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की अदालत के सामने सुनवाई के दौरान कथित एनकाउंटर से जुड़े कई ऐसे बिंदु सामने आए, जिन पर अदालत ने गंभीरता से विचार किया। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह रहा कि यदि आरोपी 23 पुलिसकर्मियों से घिरा हुआ था और उसने पुलिस पर फायरिंग की, तो एक भी पुलिसकर्मी घायल क्यों नहीं हुआ? वहीं जवाबी कार्रवाई में रात के अंधेरे और लगभग 15 मीटर की दूरी से चलाई गई गोलियां कथित आरोपी के दोनों पैरों में ही कैसे लगीं? इन परिस्थितियों ने अदालत के सामने पुलिस मुठभेड़ के आधिकारिक दावे से जुड़े कई सवाल खड़े किए हैं।

कथित एनकाउंटर की परिस्थितियों को लेकर हाईकोर्ट ने जिस बिंदु को विशेष रूप से रेखांकित किया, वह मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों की संख्या है। अदालत के समक्ष बताया गया कि कथित मुठभेड़ के समय आरोपी को 23 पुलिसकर्मियों ने घेर रखा था। इसके बावजूद पुलिस के अनुसार आरोपी की ओर से फायरिंग की गई, लेकिन इस फायरिंग में किसी भी पुलिसकर्मी के घायल होने की बात सामने नहीं आई। यही परिस्थिति अदालत के लिए महत्वपूर्ण सवाल बनी।यदि एक व्यक्ति 23 पुलिसकर्मियों से घिरा था और उसने फायरिंग की, तो उस फायरिंग का प्रभाव क्या था और पुलिसकर्मियों की स्थिति क्या थी—इन सवालों की स्वतंत्र जांच जरूरी मानी गई।

रात का अंधेरा, 15 मीटर की दूरी और दोनों पैरों में सटीक निशाना
मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू तत्कालीन SHO अश्वनी कुमार दुबे की ओर से की गई कथित फायरिंग है। अदालत में उपलब्ध तथ्यों के अनुसार, रात के समय लगभग 15 मीटर की दूरी से गोली चलाई गई और गोली आरोपी के दोनों पैरों में लगी। हाईकोर्ट ने इसी परिस्थिति को गंभीरता से लेते हुए SHO की शूटिंग क्षमता की जांच का निर्देश दिया है। जांच में यह महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित अधिकारी की फायरिंग दक्षता क्या थी, उस समय प्रकाश की स्थिति कैसी थी, दूरी कितनी थी और किन परिस्थितियों में दोनों गोलियां आरोपी के पैरों में लगीं।
इस पहलू की जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि अदालत ने स्वयं इस परिस्थिति को संज्ञान में लिया है।

क्या था पूरा घटनाक्रम? अब CBI करेगी पड़ताल
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब कथित एनकाउंटर की कहानी और उसके पीछे मौजूद परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच CBI के स्तर पर होगी। जांच एजेंसी के सामने यह पता लगाने की चुनौती होगी कि घटनास्थल पर वास्तव में क्या हुआ था। पुलिसकर्मियों की स्थिति क्या थी, फायरिंग किस दिशा से हुई, कितने राउंड फायर किए गए, किस हथियार से फायरिंग हुई और गोलियों की दिशा एवं चोटों की प्रकृति कथित घटनाक्रम से मेल खाती है या नहीं—ऐसे तमाम सवाल जांच के केंद्र में रहेंगे। इसके अलावा घटनास्थल से जुड़े भौतिक साक्ष्य और पुलिस रिकॉर्ड भी जांच का हिस्सा बन सकते हैं।

‘गुड वर्क’ के नाम पर 23 पुलिसकर्मियों को पुरस्कार
मामले में एक और तथ्य ने हाईकोर्ट का ध्यान आकर्षित किया। अदालत ने कथित एनकाउंटर में शामिल सभी 23 पुलिसकर्मियों को तत्काल ‘गुड वर्क’ के नाम पर पुरस्कृत किए जाने का भी संज्ञान लिया है। यानी जिस कार्रवाई की परिस्थितियों पर अब न्यायालय ने गंभीर सवाल उठाए हैं, उसी कार्रवाई के बाद उसमें शामिल सभी 23 पुलिसकर्मियों को तत्काल पुरस्कार दिए जाने का निर्णय भी जांच के दायरे में आ सकता है। अदालत के इस रुख से यह स्पष्ट है कि जांच केवल गोली चलने की घटना तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि कथित एनकाउंटर के बाद पुलिस प्रशासन द्वारा उठाए गए कदमों की परिस्थितियों को भी देखा जा सकता है।

हाईकोर्ट ने CBI निदेशक को निर्देश दिया है कि मामले की जांच के लिए सक्षम अधिकारियों की टीम नामित की जाए। अदालत ने जांच को यथासंभव शीघ्र पूरा करने और तीन महीने के भीतर रिपोर्ट अदालत के समक्ष दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस आदेश के बाद अब मामले में पुलिस विभाग की आंतरिक जांच या पुलिस के दावे के बजाय एक केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा स्वतंत्र पड़ताल की जाएगी। CBI की टीम घटनाक्रम से जुड़े उपलब्ध रिकॉर्ड और साक्ष्यों की जांच कर अदालत के सामने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। कथित एनकाउंटर में तत्कालीन SHO अश्वनी कुमार दुबे की भूमिका भी जांच के महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक होगी। खास तौर पर अदालत द्वारा उनकी शूटिंग क्षमता की जांच का स्पष्ट निर्देश दिए जाने से इस मामले में तकनीकी जांच का महत्व बढ़ गया है। जांच के दौरान अधिकारी की प्रशिक्षण पृष्ठभूमि, हथियार चलाने की दक्षता और कथित घटनास्थल की परिस्थितियों को परखा जा सकता है। इसके साथ ही यह भी देखा जा सकता है कि कथित फायरिंग के समय SHO और आरोपी के बीच वास्तविक दूरी कितनी थी तथा उपलब्ध साक्ष्य पुलिस द्वारा बताए गए घटनाक्रम से कितने मेल खाते हैं।

अब CBI जांच से सामने आएगा घटनाक्रम का सच
हाईकोर्ट के आदेश ने श्रावस्ती के इस कथित एनकाउंटर को लेकर उठ रहे सवालों को अब औपचारिक जांच के दायरे में ला दिया है। एक तरफ पुलिस का दावा और दूसरी तरफ अदालत द्वारा दर्ज की गई परिस्थितियों को लेकर उठे सवाल—इन दोनों के बीच वास्तविकता क्या है, इसका निर्धारण अब CBI की जांच से होगा। विशेष रूप से तीन सवाल इस पूरे मामले के केंद्र में रहेंगे—
पहला, 23 पुलिसकर्मियों से घिरे कथित आरोपी की फायरिंग में एक भी पुलिसकर्मी घायल क्यों नहीं हुआ?
दूसरा, रात के अंधेरे में लगभग 15 मीटर की दूरी से चली गोलियां दोनों पैरों में ही कैसे लगीं?
तीसरा, कथित एनकाउंटर में शामिल सभी 23 पुलिसकर्मियों को तत्काल ‘गुड वर्क’ के नाम पर पुरस्कृत करने का निर्णय किन परिस्थितियों में लिया गया?
इन सवालों के जवाब अब CBI की जांच और अदालत में दाखिल होने वाली रिपोर्ट से तलाशे जाएंगे।

तीन महीने की समय सीमा पर टिकी निगाहें
हाईकोर्ट ने CBI को यथासंभव तीन महीने में जांच रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। ऐसे में अब इस मामले की अगली दिशा जांच की प्रगति और उसके निष्कर्षों पर निर्भर करेगी। CBI की रिपोर्ट यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है कि कथित एनकाउंटर में पुलिस द्वारा बताया गया घटनाक्रम उपलब्ध साक्ष्यों से कितना मेल खाता है और किन परिस्थितियों में छुटकउ उर्फ अलाउद्दीन को दोनों पैरों में गोली लगी। फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश के बाद श्रावस्ती का यह कथित एनकाउंटर महज एक पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं रह गया है, बल्कि पुलिस की फायरिंग, घटनास्थल की परिस्थितियों, 23 पुलिसकर्मियों की मौजूदगी, पुरस्कार दिए जाने और SHO की शूटिंग क्षमता—इन सभी पहलुओं की स्वतंत्र जांच का विषय बन गया है।

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