Ayush Malik मामले में हाईकोर्ट का फैसला: बालिग को धर्म और जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता

Astitva Times Desk
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लखनऊ। प्रदेश के शामली जिले के बहुचर्चित आयुष मलिक धर्मांतरण और अंतरधार्मिक विवाह मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को अहम आदेश दिया। अदालत ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका का निस्तारण करते हुए कहा कि आयुष मलिक बालिग है और अपने जीवन से जुड़े फैसले अपनी इच्छा के अनुसार लेने के लिए स्वतंत्र है। अदालत में पेश किए गए आयुष ने कथित तौर पर कहा कि उसने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया और चांदनी कुरैशी से विवाह किया। यह मामला आयुष को कथित तौर पर उसके पिता द्वारा उसकी इच्छा के विरुद्ध रोके जाने के आरोप से जुड़ा था। याचिका पर पिछले सप्ताह 9 सितंबर को हुई सुनवाई में हाईकोर्ट ने आयुष को 16 सितंबर को अदालत के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया था।निर्धारित तारीख पर आयुष को हाईकोर्ट के समक्ष पेश किया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अदालत ने उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्व देते हुए स्पष्ट किया कि एक वयस्क व्यक्ति को अपने धर्म और जीवनसाथी के संबंध में निर्णय लेने की स्वतंत्रता है। अदालत ने इसी आधार पर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को निस्तारित कर दिया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार आयुष ने अदालत के सामने अपने धर्म परिवर्तन और विवाह को स्वैच्छिक बताया। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि उसने अपनी पत्नी चांदनी कुरैशी के साथ रहने की इच्छा व्यक्त की।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
मामला जून 2026 में सामने आया था। आयुष मलिक के चांदनी कुरैशी से विवाह करने और इस्लाम धर्म अपनाने के बाद विवाद खड़ा हुआ। इसके बाद शामली पुलिस ने चांदनी कुरैशी और उसके परिवार के सदस्यों समेत कई लोगों के खिलाफ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 समेत अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया था। इस मामले में चांदनी कुरैशी और उसके परिवार के सदस्यों की गिरफ्तारी भी हुई। दूसरी ओर आयुष की ओर से यह दावा किया गया कि उसने धर्म परिवर्तन और विवाह अपनी इच्छा से किया था।

अवैध हिरासत का आरोप
बाद में आयुष के दोस्त सुल्तान ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि आयुष को उसके पिता ने उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने पास रखा है। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि धर्म परिवर्तन और विवाह के बाद आयुष की स्वतंत्रता प्रभावित की गई। दूसरी तरफ, इस मामले में आयुष के पिता का पक्ष भी सामने आया था। इसलिए अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या एक बालिग व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध हिरासत में रखा जा रहा है। 9 सितंबर के आदेश में अदालत ने आरोपों को गंभीर प्रकृति का मानते हुए आयुष को पेश करने का निर्देश दिया था।

हाईकोर्ट ने आज क्या तय किया?
16 सितंबर की सुनवाई में आयुष के अदालत के सामने पेश होने के बाद हाईकोर्ट ने उसकी स्वतंत्रता को बरकरार रखा। अदालत ने माना कि आयुष बालिग है और वह अपनी इच्छा के अनुसार निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है।
इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि आयुष को केवल उसके धर्म परिवर्तन या विवाह के कारण उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी व्यक्ति की हिरासत में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को निस्तारित कर दिया। आज का हाईकोर्ट आदेश मुख्य रूप से आयुष की कथित हिरासत और उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर है। इससे चांदनी कुरैशी और अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज धर्मांतरण संबंधी FIR अपने आप समाप्त नहीं हो जाती और न ही आज के आदेश को उस आपराधिक मामले में आरोपों के सही या गलत होने का अंतिम फैसला माना जा सकता है। इसी तरह, अदालत द्वारा आयुष की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मान्यता दिया जाना यह भी नहीं दर्शाता कि FIR में लगाए गए सभी आरोप न्यायिक रूप से झूठे घोषित कर दिए गए हैं।

आयुष मलिक मामले में 16 सितंबर का हाईकोर्ट आदेश मूल रूप से एक बालिग व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा है। अदालत ने आयुष को अपनी इच्छा के अनुसार जीवन संबंधी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र माना और बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निस्तारण कर दिया।
वहीं, चांदनी कुरैशी और अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज कथित अवैध धर्मांतरण का आपराधिक मामला अलग कानूनी प्रक्रिया का विषय है। इसलिए इस फैसले को “हाईकोर्ट ने धर्मांतरण केस में सभी आरोप खारिज कर दिए” या “FIR खत्म कर दी” के रूप में बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। मामले का सबसे अहम संदेश यही है कि अदालत ने एक वयस्क व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद और स्वतंत्रता को केंद्र में रखा है।

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