UP पंचायत चुनाव 2026; पुरानो के साथ ही युवाओं में भी प्रधान बनने की चाहत 

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सहारनपुर। आगामी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर भले ही अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है, लेकिन जिले भर के गांवों में चुनावी सरगर्मी तेज हो गई है। परिसीमन, मतदाता सूची, पोलिंग बूथ और पोलिंग पार्टियों की तैयारी के बीच एक बात साफ है कि इस बार ग्राम प्रधान के पद के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी। इसकी बड़ी वजह पंचायतों को मिलने वाली बढ़ती धनराशि और अधिकार भी माने जा रहे हैं।

दरअसल,1992 के 73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिला, लेकिन शुरूआती वर्षों में ग्राम पंचायतों के पास सीमित संसाधन ही थे। वर्ष 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) लागू होने और उसके बाद 14वां वित्त आयोग तथा 15वां वित्त आयोग की सिफारशों के चलते ग्राम पंचायतों को सीधे बड़ी धनराशि मिलने लगी। यही कारण है कि अब प्रधान पद केवल सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि विकास और संसाधनों से जुड़ा महत्वपूर्ण पद बन गया है।

गंगोह के वरिष्ठ पत्रकार शादाब मलिक बताते हैं कि 1990 के दशक तक ग्राम प्रधानों का चयन अक्सर सर्वसम्मति से हो जाता था। जिसमें ग्रामीण सार्वजनिक स्थान पर एकत्र होकर आपसी सहमति से किसी बुजुर्ग या सम्मानित व्यक्ति को प्रधान चुन लेते थे। तहसील या विकास खंड के अधिकारी इस चयन को प्रमाणित कर देते थे। उस समय प्रधान को न तो कोई सरकारी निधि मिलती थी और न ही कोई भत्ता। बुजुर्ग बताते हैं कि 70 -80 के दशक में प्रधान बनने के लिए लोग तैयार ही नही होते थे। कई बार गांव के बुजुर्ग को सर्वसम्मति से या दबाव में यह जिम्मेदारी सौंप दी जाती थी।समय के साथ जब एक से अधिक दावेदार सामने आने लगे, तो गांवों में खुली बैठक कर निर्णय लिया जाता था। सभी ग्रामीण एकत्र होकर दावेदारों के समर्थन में हाथ उठाते थे। जिस उम्मीदवार के पक्ष में अधिक हाथ उठते, उसे प्रधान घोषित कर दिया जाता था और अधिकारी प्रमाण पत्र जारी कर देते थे।

अब प्रधानी बना प्रतिस्पर्धी और खर्चीला चुनाव
शादाब मलिक का कहना है कि अब पंचायत चुनाव पूरी तरह बदल चुका है। पंचायतों को मिलने वाली निधि और योजनाओं के चलते यह चुनाव काफी प्रतिस्पर्धी और खचीर्ला हो गया है। बताया जाता है कि एक प्रत्याशी चुनाव में कई लाख रुपये खर्च कर देता है। नामांकन से पहले ही गांवों में दावतों और अन्य गतिविधियों का दौर शुरू हो जाता है।

शादाब मलिक का कहना है कि पहले प्रधान केवल सामाजिक दायित्व निभाता था, जबकि अब विकास कार्यों के साथ-साथ आर्थिक पहलू भी जुड़ गए हैं। यही कारण है कि अब युवा वर्ग भी बड़ी संख्या में प्रधान पद के लिए दावेदारी कर रहा है। ग्राम पंचायत व्यवस्था में समय के साथ बड़ा परिवर्तन आया है। पहले जहां सादगी और सर्वसम्मति से प्रधान चुना जाता था, वहीं अब बढ़ती निधि और अधिकारों के कारण यह पद अधिक प्रभावशाली और आकर्षक बन गया है। ऐसे में आगामी पंचायत चुनाव में प्रधान पद के लिए जिले भर में कड़ा मुकाबला तय माना जा रहा है।

डा. राशिद महबूब/शमीम अली