मस्जिद विवाद: “जब निर्माण सरकारी पैसे से हुआ, तो कमेटी दोषी कैसे?” मुस्लिम संगठन का सवाल

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​MDDA की कार्रवाई के खिलाफ मुस्लिम सेवा संगठन ने खोला मोर्चा; जिलाधिकारी से उच्चस्तरीय जांच और संवाद की मांग, कहा— “कानून को ताक पर रखकर की गई एकतरफा सीलिंग।”

​देहरादून। मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (MDDA) द्वारा डोईवाला थाना क्षेत्र के थानों जामा मस्जिद को सील किए जाने की एकतरफा कार्रवाई के खिलाफ ‘मुस्लिम सेवा संगठन’ ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। संगठन ने इस कदम को प्रशासनिक तानाशाही और धार्मिक स्वतंत्रता पर आघात बताते हुए प्रदर्शन किया। संगठन के अध्यक्ष नईम कुरैशी ने सीधे तौर पर प्रशासन की नीयत पर सवाल उठाते हुए ₹3 करोड़ 30 लाख के सरकारी बजट के दुरुपयोग का सनसनीखेज आरोप लगाया है।

​ “सरकारी पैसे से हुआ कमरा निर्माण, तो सजा इबादतगाह को क्यों?”
​ मुस्लिम सेवा संगठन के अध्यक्ष नईम कुरैशी ने ज्ञापन सौंपते हुए प्रशासनिक अधिकारियों के सामने तीखे सवाल खड़े किए हैं। नईम कुरैशी ने कहा:
​”जिस कथित कमरे के अवैध निर्माण को आधार बनाकर पूरी मस्जिद को सील किया गया है, उसका निर्माण किसी निजी फंड से नहीं बल्कि सरकारी पैसे, सरकारी योजना और सरकारी विभाग द्वारा किया गया है। यह सीधे तौर पर संबंधित विभाग के अधिकारियों द्वारा ड्यूटी में लापरवाही (Dereliction of Duty) का मामला है।

​उन्होंने कहा कि यदि किसी सरकारी अधिकारी या व्यक्ति ने गलत तरीके से फंड का इस्तेमाल किया या गलत निर्माण कराया, तो उसके लिए पूरी मस्जिद कमेटी या स्थानीय नमाजियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह जनता के टैक्स के पैसे का खुल्लम -खुल्ला मिस -एप्रोप्रिएशन (गबन) है, जिसकी जांच करने के बजाय प्रशासन ने उल्टा पीड़ितों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है।

​ “संवाद से पहले कार्रवाई क्यों?”
वैधानिक प्रक्रिया पर उठाए सवाल
​संगठन के उपाध्यक्ष आकिब कुरैशी द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में लोकतांत्रिक और संवैधानिक मर्यादाओं का हवाला दिया गया है। संगठन का कहना है कि किसी भी विवाद (चाहे वह प्रशासनिक हो या भूमि संबंधी) का समाधान संवाद, नोटिस और सुनवाई के जरिए निकाला जाना चाहिए था। जबकि इस मामले में MDDA और एसडीएम डोईवाला ने स्थानीय पक्ष को न तो अपनी बात रखने का समय दिया और न ही कभी मिलने की जहमत उठाई।

आकिब कुरैशी ने कहा कि सीलिंग तो ​अंतिम विकल्प होना चाहिए था। किसी भी जीवंत धार्मिक स्थल पर सीधे ऐसी कठोर कार्रवाई करना लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। न्याय की प्रक्रिया केवल कागजों पर नहीं, बल्कि पारदर्शी रूप से धरातल पर दिखनी चाहिए।

​अध्यक्ष नईम कुरैशी ने कहा कि वे कानून के शासन (Rule of Law) का सम्मान करते हैं और किसी भी अवैध गतिविधि के साथ नहीं हैं। लेकिन जिस ‘कठोर और दमनकारी’ (Draconian) तरीके से नियमों को ताक पर रखकर सीलिंग की गई है, उसका विरोध शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से जारी रहेगा। संगठन ने मांग की है कि मामले को सुलझाने के लिए तत्काल प्रभाव से 10 लोगों के एक स्थानीय डेलिगेशन की MDDA अधिकारियों के साथ बैठक सुनिश्चित कराई जाए, ताकि आज तक जो दस्तावेज अधिकारियों ने देखने से इनकार किए हैं, उन्हें पटल पर रखा जा सके।

​ ज्ञापन में लिखी गईं 5 प्रमुख मांगें:
​मुस्लिम सेवा संगठन ने देहरादून के जिलाधिकारी के नाम लिखा गया एक विस्तृत मांग पत्र सौंपते हुए निम्नलिखित बिंदुओं पर तत्काल कार्रवाई की मांग की है:
​उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच: थानों जामा मस्जिद को सील किए जाने के पूरे घटनाक्रम और ₹3.30 करोड़ के कथित सरकारी फंड के इस्तेमाल की उच्चस्तरीय जांच हो।
​एकतरफा कार्रवाई पर रोक: मामले से जुड़े सभी पक्षों (मस्जिद कमेटी व स्थानीय नागरिक) को सुनकर एक न्यायपूर्ण और संतुलित समाधान निकाला जाए।
​संवैधानिक अधिकारों की रक्षा: भारतीय संविधान के तहत प्रत्येक नागरिक को मिली धार्मिक स्वतंत्रता और इबादत के अधिकार को अक्षुण्ण रखा जाए।
​प्रभावी संवाद तंत्र: प्रशासन और स्थानीय प्रतिनिधियों के बीच गतिरोध को खत्म करने के लिए तुरंत संवाद की व्यवस्था स्थापित हो।
​समान नीति का निर्धारण: प्रदेश में धार्मिक स्थलों से जुड़े संवेदनशील मामलों के निस्तारण के लिए एक स्पष्ट, पारदर्शी और समान नीति (Uniform Policy) लागू की जाए ताकि समाज में असुरक्षा की भावना न फैले।

​ संगठन ने स्पष्ट किया कि देवभूमि उत्तराखंड की हमेशा से सामाजिक एकता, आपसी भाईचारे और धार्मिक सह- अस्तित्व की मिसाल रही है। ऐसे नाजुक वक्त में प्रशासन को ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाना चाहिए जिससे समाज में विभाजन, अविश्वास या तनाव पैदा हो। संगठन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के पक्ष में है और उम्मीद करता है कि प्रदेश सरकार जनता की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए इस संवेदनशील मामले में एक सकारात्मक और न्यायसंगत पहल करेगी। ​”न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।” इसी लोकतांत्रिक संदेश के साथ मुस्लिम सेवा संगठन ने शासन -प्रशासन से पारदर्शी रुख अपनाने की अपील की है।