देहरादून। भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों के दौरान विपक्षी दलों में हुई बड़ी टूट ने राष्ट्रीय राजनीति का पूरा गणित बदल दिया है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), मध्य प्रदेश में कांग्रेस, बिहार से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों तक कई दलों में हुए विभाजन, बगावत और पलायन का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिलता दिखाई दे रहा है। इसका असर केवल राज्यों की सत्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकसभा और राज्यसभा में भी भाजपा की स्थिति लगातार मजबूत होती जा रही है।
राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि किसी दल की ताकत केवल उसके विस्तार से नहीं, बल्कि विरोधियों की कमजोरी से भी बढ़ती है। मौजूदा दौर में यही तस्वीर राष्ट्रीय राजनीति में दिखाई दे रही है। महाराष्ट्र में शिवसेना का विभाजन और उसके बाद एनसीपी का टूटना केवल राज्य सरकार के गठन तक सीमित घटनाएं नहीं थीं। इन घटनाओं ने विपक्षी राजनीति को गहरा झटका दिया। इसी प्रकार कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों के भीतर असंतोष, नेताओं का पलायन और गुटबाजी ने विपक्षी एकता के दावों को कमजोर किया है।भाजपा ने इन परिस्थितियों का राजनीतिक लाभ उठाते हुए न केवल अपने सहयोगी दलों का दायरा बढ़ाया, बल्कि संसद के भीतर भी अपनी प्रभावशीलता को मजबूत किया।
इन दलों में टूट से भाजपा को मिला फायदा
शिवसेना: महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा उलटफेर
2022 में शिवसेना में हुई बगावत ने महाराष्ट्र की राजनीति का पूरा समीकरण बदल दिया। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायक उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर अलग हो गए। इसके बाद भाजपा के समर्थन से नई सरकार बनी। इससे भाजपा को न केवल सत्ता में वापसी मिली, बल्कि महाराष्ट्र में उसका राजनीतिक प्रभाव भी बढ़ा।
एनसीपी: पवार परिवार की पार्टी में विभाजन
शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में अजित पवार की बगावत ने विपक्षी महाविकास आघाड़ी को कमजोर कर दिया। अजित पवार गुट एनडीए सरकार का हिस्सा बना और भाजपा को महाराष्ट्र में अतिरिक्त राजनीतिक ताकत मिली।तृणमूल कांग्रेस:
हालांकि तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में अभी भी मजबूत स्थिति में है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उसके कई सांसद, विधायक और प्रभावशाली नेता भाजपा में शामिल हुए। इससे भाजपा को बंगाल में अपना संगठन विस्तार करने और मुख्य विपक्षी शक्ति बनने का अवसर मिला।कांग्रेस:
कांग्रेस को कई राज्यों में टूट और पलायन का सामना करना पड़ा। मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ विधायकों के जाने से कमलनाथ सरकार गिर गई और भाजपा सत्ता में लौट आई। गोवा, असम, अरुणाचल प्रदेश, गुजरात और कई अन्य राज्यों में भी कांग्रेस के नेताओं ने पार्टी छोड़ी, जिसका राजनीतिक लाभ भाजपा को मिला।आम आदमी पार्टी: सांसदों के जाने से बढ़ी मुश्किलें
आम आदमी पार्टी को भी हाल के समय में बड़ा राजनीतिक झटका लगा, जब उसके कई राज्यसभा सांसदों ने पार्टी का साथ छोड़ दिया। इनमें राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, स्वाति मालीवाल, विक्रम साहनी, राजिंदर गुप्ता तथा हरभजन सिंह के नाम प्रमुख रूप से शामिल रहे। इन नेताओं के पार्टी से अलग होने से राज्यसभा में आम आदमी पार्टी की ताकत कमजोर हुई और विपक्षी राजनीति को भी झटका लगा।जेडीयू और अन्य क्षेत्रीय दल
बिहार की राजनीति में गठबंधन बदलने और क्षेत्रीय दलों के भीतर उथल-पुथल ने भाजपा को लगातार प्रासंगिक और निर्णायक शक्ति बनाए रखा। वहीं कई छोटे क्षेत्रीय दलों के कमजोर होने से भी विपक्षी वोटों का बिखराव बढ़ा, जिसका चुनावी लाभ भाजपा को मिला।लोकसभा में भाजपा पहले से ही सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति है। लेकिन विपक्षी दलों के भीतर टूट और सांसदों के बदलते राजनीतिक रुख ने सत्ता पक्ष को और अधिक आत्मविश्वास दिया है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो भाजपा और उसके नेतृत्व वाले एनडीए का प्रभाव ऐसा स्तर छू सकता है, जहां महत्वपूर्ण विधायी फैसलों के लिए विपक्ष का प्रतिरोध पहले की तुलना में काफी कमजोर पड़ जाए। यह स्थिति केवल संख्या बल की नहीं, बल्कि राजनीतिक मनोबल की भी है। जहां विपक्ष अपने अस्तित्व और नेतृत्व के सवालों से जूझ रहा है, वहीं भाजपा लगातार चुनावी और संगठनात्मक विस्तार में लगी हुई है।
राज्यसभा का बदलता गणित
राज्यसभा को हमेशा वह मंच माना जाता रहा है जहां केंद्र सरकार को राज्यों की राजनीति के कारण संतुलन का सामना करना पड़ता है। लेकिन पिछले वर्षों में कई राज्यों में भाजपा या उसके सहयोगियों की बढ़ती शक्ति ने उच्च सदन का समीकरण भी बदल दिया है। राज्यों में सरकारें बदलने, क्षेत्रीय दलों के कमजोर होने और नए राजनीतिक गठबंधनों के बनने से भाजपा का प्रभाव राज्यसभा में लगातार बढ़ रहा है। यही कारण है कि जिन विधेयकों को कभी ऊपरी सदन में कड़ी चुनौती मिलती थी, अब उनके पारित होने की राह अपेक्षाकृत आसान होती जा रही है।
क्या दो-तिहाई समर्थन की ओर बढ़ रहा है सत्ता पक्ष?
राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा इसी प्रश्न को लेकर है। विपक्षी दलों में लगातार टूट, नेताओं का पलायन और भाजपा का बढ़ता संगठनात्मक विस्तार यह संकेत दे रहा है कि आने वाले वर्षों में संसद का शक्ति संतुलन और अधिक सत्ता पक्ष के पक्ष में जा सकता है।
दो-तिहाई बहुमत केवल एक संख्या नहीं है। यह वह शक्ति है जो संवैधानिक संशोधनों, बड़े संस्थागत सुधारों और दूरगामी नीतिगत फैसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। यदि भाजपा और एनडीए भविष्य में इस स्तर के समर्थन के करीब पहुंचते हैं तो राष्ट्रीय राजनीति की दिशा पर उसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। यदि संसद में सत्ता पक्ष का प्रभाव और बढ़ता है तो बड़े संवैधानिक, प्रशासनिक और चुनावी सुधारों को आगे बढ़ाने की संभावनाएं भी मजबूत हो सकती हैं। हालांकि लोकतंत्र में संख्या बल जितना महत्वपूर्ण होता है, उतनी ही अहम राजनीतिक सहमति और जनसमर्थन की भूमिका भी होती है।शिवसेना, एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों में हुई टूट ने भारतीय राजनीति का शक्ति संतुलन बदल दिया है। विपक्ष जहां नेतृत्व संकट, गुटबाजी और संगठनात्मक चुनौतियों से जूझ रहा है, वहीं भाजपा इस राजनीतिक शून्य को भरते हुए राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पकड़ लगातार मजबूत करती दिखाई दे रही है। आज सवाल केवल यह नहीं है कि भाजपा कितनी मजबूत हुई है, बल्कि यह है कि क्या विपक्ष खुद को पुनर्गठित कर इस बढ़ते दबदबे को चुनौती देने की स्थिति में आ पाएगा। फिलहाल तस्वीर यही बताती है कि टूटते विपक्ष के बीच भाजपा का राजनीतिक कद और संसदीय प्रभाव दोनों लगातार बढ़ रहे हैं, और इसका असर आने वाले वर्षों में देश की राजनीति पर निर्णायक रूप से दिखाई दे सकता है।












