विश्वविद्यालय स्तर पर गढ़वाली भाषा के लिए वेबीनार आयोजित, आगे भी जारी रहेगी वेबीनार की श्रंखला

MS Malik
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सेंटर ऑफ एक्सिलेंस के लिए श्री गुरु राम राय विश्वविद्यालय की पहल

देहरादून। गढ़वाली भाषा का विकास एवं जन सहभागिता विषय पर श्री गुरु राम राय विश्वविद्यालय के गढ़वाली भाषा एवं संस्कृति विभाग द्वारा शनिवार को एक वेबीनार आयोजित किया गया। वेबीनार में उत्तराखण्ड के प्रमुख साहित्यकारों एवं बु़द्धिजीवियों ने भाग लिया। विश्वविद्यालय स्तर पर गढ़वाली भषा का यह दुनिया का पहला वेनिनार है। अब तक गढ़वाली भाषा में स्नातकोत्तर डिग्री कोर्स केवल एसजीआरआर विश्वविद्यालय में ही उपलब्ध है।
विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री महंत देवेंद्र दास जी महाराज के आशीर्वचन से शुरू हुए इस वेबीनार में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर (डॉ.) यू. एस. रावत ने कहा कि देश के बड़े विश्वविद्यालयों की तर्ज पर हमारा भी प्रयास होगा कि श्री गुरु राम राय विश्वविद्यालय को गढ़वाली भाषा के उत्कृष्टता के केंद्र के रूप में स्थापित किया जाए। श्री महाराज जी का सपना है कि गढ़वाली भाषा के क्षेत्र में विश्वविद्यालय की एक खास पहचान बने।
कुलपति ने वक्ताओं को उनके उत्कृष्ट विचारों के लिए सराहा। उन्होंने कहा कि दिल के मरीज होने के बावजूद भी लेखक सुरेश ग्वाड़ी जी ने गढ़वाली भाषा के प्रति अपना अमूल्य योगदान दिया है। विश्वविद्यालय उनके इस योगदान के लिए एक सम्मान समारोह आयोजित कर उन्हें सम्मानित करेगा।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रो. (डॉ.) दीपक साहनी, विश्वविद्यालय समन्वयक डॉ. मालविका कांडपाल ने कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए सभी को बधाई दी।
गढ़वाली संगीत की पहचान गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी स्वास्थ्य परेशानी के चलते वेबिनार में सक्रिय रूप से शामिल नहीं हो सके। उन्होंने अपनी शुभकामनाएं प्रेषित कीं।
प्रसिद्ध लोक संस्कृति कर्मी और लेखक गणेश खुगसाल गणी ने कहा कि गढ़वाली भाषा के विकास का मात्र एक उपाय है कि इसे आम बोलचाल में अपनाएं और जनगणना के समय अपनी भाषा के रूप में गढ़वाली को दर्ज कराएं।

भारत सरकार में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे कर्नल डॉ. डी.पी. डिमरी ने वेबीनार को संबोधित करते हुए कहा कि तकनीकी माध्यम से भाषा के विकास को आगे बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने अपनी तरफ से आखर ऐप भी विकसित किया है। उन्होंने कहा कि गढ़वाली भाषा के लिए सभी को एकजुट होकर आगे आना होगा। गढ़वाल की स्वर कोकिला के नाम से प्रसिद्ध डॉ. नीता कुकरेती ने गढ़वाली भाषा के विकास पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला।

साहित्यकार सुरेश ग्वाड़ी ने हरिवंश राय बच्चन की प्रसिद्ध रचना मधुशाला के गढ़वाली रूपांतर की पांडुलिपि विश्वविद्यालय को प्रकाशन के आग्रह के साथ सौंपी। उन्होंने कहा कि वह दिल के मरीज और डायलिसिस में होने के बावजूद भी गढ़वाली साहित्य लेखन में सक्रिय हैं। उनका यह भावनात्मक पक्ष श्रोताओं के दिल को छू गया।
इस अवसर पर मानविकी एंव सामाजिक विज्ञान संकाय की डीन डॉ. गीता रावत ने कहा कि इस तरह के आयोजन आगे भी होते रहेंगे। वेबीनार में एम.ए गढ़वाली भाषा की छात्रा आशा ममर्गाइं ने गढ़वाली में गणेश वंदना और स्वरचित कविता प्रस्तुत की। वेबीनार का मुख्य आकर्षण इसका पूर्णतः गढ़वाली भाषा में गढ़वाली भाषा के विकास के लिए आयोजित किया जाना रहा। कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन डॉ. राजेंद्र सिंह नेगी ने किया। डॉ. अनिल थपलियाल ने सभी वक्ताओं एवं श्रोताओं का धन्यवाद किया।
इस अवसर पर डॉ संजय शर्मा, डॉ. कंचन जोशी, डॉ. विजेंद्र गुसांईं, डॉ. आशा बाला, डॉ. आरती भट्ट, डॉ. अंजलि डबराल के साथ ही बीए मास कम्युनिकेशन के छात्र अंशुल गुप्ता ने तकनीकी सहयोग दिया।

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