सर्किल रेट हेराफेरी से स्टांप शुल्क चोरी, जमीनों में करोड़ों के घोटाले का खुलासा

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291 भूखंडों की संदिग्ध रजिस्ट्रियां, 47 मामलों में जांच तेज; एक साल पहले भी उठे थे सवाल, फिर भी जारी रहा खेल

देहरादून। विकासनगर स्थित सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में सर्किल रेट में हेराफेरी कर स्टांप शुल्क चोरी का एक बड़ा और संगठित मामला सामने आया है। प्रारंभिक जांच में चाय बागान की जमीनों से जुड़े 291 भूखंडों की रजिस्ट्रियों पर गंभीर सवाल उठे हैं। प्रशासन ने इनमें से 47 मामलों को चिन्हित कर जांच शुरू कर दी है, जिससे पूरे राजस्व विभाग में हड़कंप मच गया है। यह मामला सिर्फ अनियमितता तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि इसमें एक सुनियोजित नेटवर्क की भूमिका की आशंका भी जताई जा रही है। जिस तरीके से जमीनों की कीमत कम दिखाकर रजिस्ट्रियां की गईं, उससे यह संकेत मिलता है कि इसमें कई स्तरों पर मिलीभगत हो सकती है।

जानकारी के अनुसार, पछवादून क्षेत्र में स्थित चाय बागान की जमीनों की बड़े पैमाने पर खरीद-फरोख्त हुई। इन जमीनों की वास्तविक बाजार कीमत काफी अधिक थी, लेकिन रजिस्ट्री के दौरान सर्किल रेट को कृत्रिम रूप से कम दिखाया गया। सर्किल रेट वह न्यूनतम मूल्य होता है, जिस पर किसी संपत्ति की रजिस्ट्री की जाती है और उसी आधार पर स्टांप शुल्क निर्धारित होता है। यदि सर्किल रेट कम दिखाया जाता है, तो सीधे तौर पर सरकार को मिलने वाला राजस्व भी कम हो जाता है। जांच में सामने आया है कि 0 से 50 मीटर की दूरी वाले भूखंड, जो सामान्यतः सबसे अधिक मूल्यवान होते हैं, उन्हें 50 से 350 मीटर या उससे अधिक दूरी की श्रेणी में दिखाया गया। इससे जमीन की कीमत कम आंकी गई और स्टांप शुल्क में भारी कटौती हो गई।

कैसे किया गया खेल?
जमीन की वास्तविक लोकेशन को छिपाया गया
राष्ट्रीय राजमार्ग और मुख्य सड़कों के पास स्थित भूखंडों को दूरस्थ दिखाया गया
दूरी के आधार पर तय सर्किल रेट में हेरफेर किया गया
रजिस्ट्री दस्तावेजों में तकनीकी बदलाव कर कम मूल्य दर्ज किया गया
इस पूरी प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी कर सुनियोजित तरीके से राजस्व की चोरी की गई।

गौरतलब है कि लगभग एक वर्ष पहले भी इसी प्रकार का मामला सामने आया था। उस समय भी चाय बागान की जमीनों की रजिस्ट्रियों में गड़बड़ी की शिकायतें मिली थीं। हालांकि, उस मामले में सीमित कार्रवाई के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उस समय सख्त कदम उठाए जाते, तो वर्तमान में इतने बड़े स्तर पर अनियमितताएं सामने नहीं आतीं। जिला प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए विस्तृत जांच के आदेश दिए हैं।

47 मामलों की प्राथमिक जांच जारी है
सभी 291 भूखंडों की रजिस्ट्रियों का रिकॉर्ड खंगाला जा रहा है
संदिग्ध दस्तावेजों की पुनः जांच की जा रही है
कुछ मामलों में तहसीलदार द्वारा दाखिल-खारिज निरस्त किए जा चुके हैं।

सूत्रों के अनुसार, संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों से जवाब तलब किया जा रहा है और जल्द ही जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई हो सकती है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस हेराफेरी से सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है। चूंकि यह मामला सैकड़ों भूखंडों से जुड़ा है, इसलिए कुल नुकसान का आंकड़ा और भी बड़ा हो सकता है।

राजस्व विभाग के जानकारों के अनुसार, यदि हर रजिस्ट्री में लाखों रुपये की स्टांप शुल्क चोरी हुई है, तो कुल नुकसान कई करोड़ तक पहुंचना स्वाभाविक है। मामले के उजागर होने के बाद स्थानीय स्तर पर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। रजिस्ट्रार कार्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। आम लोगों के बीच यह चर्चा है कि बिना अंदरूनी मिलीभगत के इतने बड़े स्तर पर यह संभव नहीं था।

भूमि और राजस्व मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि:
सर्किल रेट निर्धारण की प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाने की जरूरत है
रजिस्ट्री प्रक्रिया में डिजिटल सत्यापन को अनिवार्य किया जाना चाहिए
लोकेशन आधारित ऑटोमैटिक वैल्यू सिस्टम लागू होना चाहिए
दोषियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार जांच निष्पक्ष और निर्णायक होगी? क्या जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई होगी?
यदि इस मामले में ठोस कदम उठाए जाते हैं, तो यह न केवल राजस्व व्यवस्था में सुधार लाएगा, बल्कि भविष्य में इस तरह के घोटालों पर भी अंकुश लगेगा।

कुल मिलाकर सर्किल रेट में हेराफेरी कर स्टांप शुल्क चोरी का यह मामला प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर करता है। यह सिर्फ राजस्व का नुकसान नहीं, बल्कि व्यवस्था में विश्वास को भी कमजोर करता है। अब सभी की नजरें प्रशासनिक कार्रवाई और जांच के नतीजों पर टिकी हैं।