प्रयागराज। उत्तर प्रदेश में आगामी पंचायत चुनाव को लेकर बुधवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। इस दौरान राज्य निर्वाचन आयोग ने अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव प्रक्रिया पूरी कराना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है।
सुनवाई के दौरान आयोग की ओर से अदालत को बताया गया कि प्रदेश की ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा है। ऐसे में पंचायती राज व्यवस्था को निरंतर बनाए रखने के लिए नई पंचायतों के गठन की प्रक्रिया उसी से पहले पूरी कर ली जानी चाहिए। आयोग ने अदालत को आश्वस्त किया कि पंचायत चुनाव समय पर कराने के लिए आवश्यक तैयारियां और प्रशासनिक प्रक्रिया जारी है।
यह याचिका अधिवक्ता इम्तियाज़ हुसैन द्वारा दायर की गई है। याचिका में पंचायत चुनाव की समयसीमा, निर्वाचन प्रक्रिया और प्रशासनिक तैयारियों को लेकर अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव कार्यक्रम की स्पष्ट रूपरेखा तय की जानी चाहिए, ताकि स्थानीय निकायों के संचालन में किसी प्रकार का व्यवधान न आए।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य निर्वाचन आयोग और संबंधित पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुना। आयोग ने अपने पक्ष में कहा कि पंचायत चुनाव समय पर कराना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है और आयोग इस दिशा में सभी आवश्यक कदम उठा रहा है। आयोग का यह भी कहना था कि यदि पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद चुनाव नहीं हो पाते हैं तो प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है, इसलिए समयसीमा का पालन बेहद जरूरी है।
प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी हलचल तेज हो गई है। पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव कार्यक्रम घोषित किए जाने की संभावना जताई जा रही है, ताकि नई ग्राम पंचायतों, क्षेत्र पंचायतों और जिला पंचायतों का गठन समय पर हो सके। फिलहाल अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद आगे की कार्यवाही के लिए अगली तिथि तय करने के संकेत दिए हैं। इस मामले में आने वाले दिनों में अदालत के निर्देश और राज्य निर्वाचन आयोग की तैयारियों पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।
मुख्य तथ्य:
इलाहाबाद हाईकोर्ट में पंचायत चुनाव को लेकर महत्वपूर्ण सुनवाई।
राज्य निर्वाचन आयोग ने कहा—कार्यकाल खत्म होने से पहले चुनाव कराना जरूरी।
प्रदेश की ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त होगा।
याचिका अधिवक्ता इम्तियाज़ हुसैन द्वारा दाखिल।
समय पर चुनाव कराने को लेकर आयोग ने अदालत में अपना पक्ष रखा।
यूपी पंचायत चुनाव पर ब्रेक! एक साल तक टलने के आसार
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव तय समय पर कराना मुश्किल होता दिख रहा है। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए पंचायत चुनाव लगभग एक साल तक टल सकते हैं और अब इनके 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद होने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में मौजूदा पंचायतों का कार्यकाल बढ़ाने या प्रशासक नियुक्त करने का विकल्प भी सामने आ सकता है।

प्रदेश में ग्राम पंचायतों, क्षेत्र पंचायतों और जिला पंचायतों का कार्यकाल क्रमशः 26 मई, 19 जुलाई और 11 जुलाई को समाप्त हो रहा है। जबकि पंचायत चुनाव के लिए अंतिम मतदाता सूची 15 अप्रैल को जारी होनी है। इसके अलावा आरक्षण प्रक्रिया और पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन का काम भी अभी पूरा नहीं हो पाया है। ऐसे में तय समय पर चुनाव कराना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
सूत्रों के मुताबिक सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का ध्यान वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव पर केंद्रित है। ऐसे में कोई भी राजनीतिक दल फिलहाल पंचायत चुनाव में उलझना नहीं चाहता। यही वजह है कि प्रमुख दलों की ओर से पंचायत चुनाव जल्द कराने की मांग भी सामने नहीं आ रही है।

हालांकि, पंचायत चुनाव को लेकर मामला अदालत तक पहुंच चुका है। इस संबंध में हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि यदि मतदाता सूची अप्रैल के मध्य में अंतिम रूप लेती है तो आरक्षण प्रक्रिया और चुनाव कराने के लिए बहुत कम समय बचेगा। ऐसी स्थिति में चुनाव टलने की संभावना बढ़ जाती है।
अदालत ने इस मामले में राज्य निर्वाचन आयोग से एफिडेविट भी मांगा था। सूत्रों के अनुसार आयोग ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए चुनावी तैयारियों की स्थिति स्पष्ट कर दी है। अब सबकी निगाह अदालत के फैसले पर टिकी है।
उधर, पंचायतीराज मंत्री ओम प्रकाश राजभर का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही पंचायत चुनाव जल्द कराने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि मामला अब अदालत में है और अंतिम फैसला न्यायालय के निर्देशों के बाद ही होगा।
दरअसल, त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में आरक्षण की प्रक्रिया राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के आधार पर तय होती है। लेकिन अभी तक इस आयोग का गठन नहीं हुआ है। आयोग जिलों में जाकर ओबीसी आबादी के आंकड़े जुटाने के बाद अपनी रिपोर्ट सौंपता है, जिसके आधार पर ग्राम, क्षेत्र और जिला पंचायतों में आरक्षण तय किया जाता है।
नियमों के अनुसार किसी भी ब्लॉक में ओबीसी आबादी 27 प्रतिशत से अधिक होने पर भी ग्राम प्रधान के पद 27 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षित नहीं किए जा सकते। वहीं यदि ओबीसी आबादी 27 प्रतिशत से कम है तो उसी अनुपात में आरक्षण लागू किया जाता है। हालांकि प्रदेश स्तर पर पंचायत चुनाव में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य है।
ऐसे में आयोग के गठन, आरक्षण प्रक्रिया और चुनावी तैयारियों में लगने वाले समय को देखते हुए पंचायत चुनाव के टलने की संभावना काफी मजबूत मानी जा रही है।
सहारनपुर। आगामी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर भले ही अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है, लेकिन जिले भर के गांवों में चुनावी सरगर्मी तेज हो गई है। परिसीमन, मतदाता सूची, पोलिंग बूथ और पोलिंग पार्टियों की तैयारी के बीच एक बात साफ है कि इस बार ग्राम प्रधान के पद के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी। इसकी बड़ी वजह पंचायतों को मिलने वाली बढ़ती धनराशि और अधिकार भी माने जा रहे हैं।
दरअसल,1992 के 73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिला, लेकिन शुरूआती वर्षों में ग्राम पंचायतों के पास सीमित संसाधन ही थे। वर्ष 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) लागू होने और उसके बाद 14वां वित्त आयोग तथा 15वां वित्त आयोग की सिफारशों के चलते ग्राम पंचायतों को सीधे बड़ी धनराशि मिलने लगी। यही कारण है कि अब प्रधान पद केवल सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि विकास और संसाधनों से जुड़ा महत्वपूर्ण पद बन गया है।
गंगोह के वरिष्ठ पत्रकार शादाब मलिक बताते हैं कि 1990 के दशक तक ग्राम प्रधानों का चयन अक्सर सर्वसम्मति से हो जाता था। जिसमें ग्रामीण सार्वजनिक स्थान पर एकत्र होकर आपसी सहमति से किसी बुजुर्ग या सम्मानित व्यक्ति को प्रधान चुन लेते थे। तहसील या विकास खंड के अधिकारी इस चयन को प्रमाणित कर देते थे। उस समय प्रधान को न तो कोई सरकारी निधि मिलती थी और न ही कोई भत्ता। बुजुर्ग बताते हैं कि 70 -80 के दशक में प्रधान बनने के लिए लोग तैयार ही नही होते थे। कई बार गांव के बुजुर्ग को सर्वसम्मति से या दबाव में यह जिम्मेदारी सौंप दी जाती थी।समय के साथ जब एक से अधिक दावेदार सामने आने लगे, तो गांवों में खुली बैठक कर निर्णय लिया जाता था। सभी ग्रामीण एकत्र होकर दावेदारों के समर्थन में हाथ उठाते थे। जिस उम्मीदवार के पक्ष में अधिक हाथ उठते, उसे प्रधान घोषित कर दिया जाता था और अधिकारी प्रमाण पत्र जारी कर देते थे।
अब प्रधानी बना प्रतिस्पर्धी और खर्चीला चुनाव
शादाब मलिक का कहना है कि अब पंचायत चुनाव पूरी तरह बदल चुका है। पंचायतों को मिलने वाली निधि और योजनाओं के चलते यह चुनाव काफी प्रतिस्पर्धी और खचीर्ला हो गया है। बताया जाता है कि एक प्रत्याशी चुनाव में कई लाख रुपये खर्च कर देता है। नामांकन से पहले ही गांवों में दावतों और अन्य गतिविधियों का दौर शुरू हो जाता है।
शादाब मलिक का कहना है कि पहले प्रधान केवल सामाजिक दायित्व निभाता था, जबकि अब विकास कार्यों के साथ-साथ आर्थिक पहलू भी जुड़ गए हैं। यही कारण है कि अब युवा वर्ग भी बड़ी संख्या में प्रधान पद के लिए दावेदारी कर रहा है। ग्राम पंचायत व्यवस्था में समय के साथ बड़ा परिवर्तन आया है। पहले जहां सादगी और सर्वसम्मति से प्रधान चुना जाता था, वहीं अब बढ़ती निधि और अधिकारों के कारण यह पद अधिक प्रभावशाली और आकर्षक बन गया है। ऐसे में आगामी पंचायत चुनाव में प्रधान पद के लिए जिले भर में कड़ा मुकाबला तय माना जा रहा है।
डा. राशिद महबूब/शमीम अली












