जीवित व्यक्ति को मृत दर्शाकर ज़मीन हड़पने के आरोप में कोर्ट के आदेश पर तीन के खिलाफ मुकदमा दर्ज

5

 

2002 में दिखा दी ज़मीन मालिक की मौत, अंतिम संस्कार की कथित फर्जी रसीद तक बनाई; असल में 2016 में हुई मृत्यु

देहरादून। राजधानी देहरादून में जमीन के लालच में फर्जीवाड़े की इंतहा का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि जमीन पर कब्जा करने और राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज कराने के लिए एक जिंदा व्यक्ति को कागजों में मृत घोषित कर दिया गया। इतना ही नहीं, उसकी कथित मौत और अंतिम संस्कार से जुड़ी रसीद तक तैयार कर दी गई। मामला खुलने के बाद राजस्व अभिलेखों और दस्तावेजी प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

प्रेमनगर थाना क्षेत्र से सामने आए इस मामले में न्यायालय के आदेश पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। मामले में संजय कुमार चौधरी, उनकी मां ओमवती और चंद्रावती को नामजद किया गया है। शिकायतकर्ता श्यामलाल, निवासी सिमलासग्रांट डोईवाला, ने आरोप लगाया है कि उनके पिता ताराचंद की जमीन को हड़पने की नीयत से फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया गया। शिकायत के मुताबिक, जमीन पर कब्जे की कथित साजिश की शुरुआत वर्ष 1995 में हुई, जब ताराचंद के नाम से कथित तौर पर फर्जी वसीयत तैयार की गई। इसके बाद वर्ष 2002 में ताराचंद को मृत दर्शा दिया गया। आरोप है कि उनकी मौत और अंतिम संस्कार से संबंधित दस्तावेज भी तैयार किए गए और इन्हीं कागजात के आधार पर जमीन पर दावा मजबूत करने की कोशिश की गई। मामले में सबसे सनसनीखेज पहलू यह है कि कथित दस्तावेजों में ताराचंद की मृत्यु 14 जून 2002 दर्शाई गई, जबकि शिकायतकर्ता के अनुसार ताराचंद उस समय जीवित थे और उनकी वास्तविक मृत्यु 20 नवंबर 2016 को हुई।

14 साल तक जिंदा रहे, लेकिन कागजों में पहले ही ‘मर’ गए!
शिकायतकर्ता के आरोपों के मुताबिक, ताराचंद को वर्ष 2002 में ही कागजों में मृत घोषित कर दिया गया, जबकि उनकी वास्तविक मृत्यु इसके करीब 14 वर्ष बाद 2016 में हुई। ग्राम पंचायत सिमलास ग्रांट से जारी ताराचंद के वास्तविक मृत्यु प्रमाण पत्र को भी शिकायत का अहम आधार बताया गया है। यही विरोधाभास अब पूरे मामले की जांच का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु बन गया है। सवाल उठ रहा है कि यदि ताराचंद की वास्तविक मृत्यु वर्ष 2016 में हुई, तो वर्ष 2002 में उनकी मृत्यु और अंतिम संस्कार से संबंधित दस्तावेज आखिर किस आधार पर तैयार किए गए?

अंतिम संस्कार की कथित फर्जी रसीद से लेकर राजस्व रिकॉर्ड तक
शिकायतकर्ता का आरोप है कि कथित फर्जीवाड़ा केवल वसीयत तैयार करने तक सीमित नहीं रहा। ताराचंद की कथित मृत्यु को साबित करने के लिए अंतिम संस्कार से संबंधित रसीद और अन्य दस्तावेज भी तैयार किए गए। इसके बाद इन्हीं दस्तावेजों को आधार बनाकर जमीन के राजस्व अभिलेखों में आरोपियों के पक्ष में नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया कराई गई।
अगर जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला केवल जमीन विवाद का नहीं, बल्कि कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार करने, उनका इस्तेमाल करने और राजस्व अभिलेखों में उनके आधार पर कार्रवाई कराने का भी गंभीर मामला बन सकता है।

शिकायतकर्ता श्यामलाल की ओर से न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के बाद न्यायालय के आदेश पर प्रेमनगर थाना पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया। मामले में संजय कुमार चौधरी, ओमवती और चंद्रावती को आरोपी बनाया गया है।
प्रकाशित जानकारी के अनुसार, संजय कुमार चौधरी को प्रतिष्ठित कॉलेज के मालिक के बेटे के रूप में बताया गया है, जबकि ओमवती उनकी मां हैं। तीसरी आरोपी चंद्रावती का नाम भी मुकदमे में शामिल है। मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस के सामने अब कई अहम सवाल हैं। कथित वसीयत कब और किसने तैयार की? वर्ष 2002 में ताराचंद की मृत्यु का दस्तावेज किस आधार पर बना? अंतिम संस्कार की कथित रसीद कहां से जारी हुई? इन दस्तावेजों को राजस्व अभिलेखों में किस तरह इस्तेमाल किया गया? और सबसे अहम—इस पूरी कथित साजिश में और कौन-कौन लोग शामिल थे?
पुलिस द्वारा दस्तावेजों की सत्यता, राजस्व रिकॉर्ड में हुई प्रविष्टियों और आरोपियों की भूमिका की जांच की जा रही है।

इस पूरे मामले में ग्राम पंचायत सिमलासग्रांट से जारी 20 नवंबर 2016 का वास्तविक मृत्यु प्रमाण पत्र बेहद अहम दस्तावेज माना जा रहा है। एक तरफ जहां कथित फर्जी दस्तावेजों में ताराचंद की मृत्यु 14 जून 2002 दिखाई गई, वहीं दूसरी तरफ सरकारी रिकॉर्ड में उनकी वास्तविक मृत्यु वर्ष 2016 में दर्ज होने का दावा किया गया है।अब जांच का दारोमदार इस बात पर है कि इन दोनों अलग- अलग मृत्यु तिथियों से जुड़े दस्तावेजों में वास्तविकता क्या है और कथित फर्जी दस्तावेजों को तैयार कराने एवं इस्तेमाल करने के पीछे किसकी भूमिका थी। जिंदा व्यक्ति को कागजों में मृत दिखाकर जमीन पर अधिकार हासिल करने के आरोप ने इस मामले को बेहद गंभीर बना दिया है। पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि कथित फर्जीवाड़े की पूरी कड़ी कहां से शुरू हुई और इसमें कौन-कौन लोग शामिल थे।
नोट: उपरोक्त समाचार में आरोप शिकायतकर्ता/मुकदमे में लगाए गए आरोपों के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।